(hi) गुरु सियाग योग

शाब्दिक अर्थ है “बिना जपे ही जपा जाए’ । जब कोई साधक गुरुदेव सियाग द्वारा बताये गए संजीवनी मन्त्र का मानसिक जाप लगातार कुछ सप्ताह तक करता है, तो ऐसा करने पर वह मन्त्र साधक के भीतर बिना प्रयास के ही अनवरत अपने आप जपा जाने लगता है। साधक को केवल अपने भीतर बिना प्रयास के जापे जाने वाले मन्त्र पर केवल ध्यान भर देना होता है। अध्यात्म की भाषा में, मंत्र जाप की इस अवस्था को ही ‘अजपा जाप’ कहते हैं। यह क्रिया साधक की इच्छा और प्रयास के बिना, स्वयं कुण्डलिनी शक्ति संचालित करती है।

मन्त्र का मानसिक जाप आरम्भ करने से लेकर अजपा की अवस्था प्राप्त होने की, वैसे तो कोई निश्चित अवधि नहीं है, क्योंकि प्रत्येक साधक के लिए ये अलग अलग हो सकती है। लेकिन एक बात तय है कि अजपा की अवस्था उन सभी साधकों को अवश्य अनुभव होती है जो हर यथासंभव दिन भर में अधिक से अधिक समय तक संजीवनी मंत्र का मानसिक जाप करते रहते हैं। यदि संजीवनी मन्त्र के मानसिक जाप नियमित रूप से नहीं होता है और बीच में कुछ दिन के लिए रोक दिया जाता है, तो ये असंगत या inconsistent अभ्यास ही माना जायेगा। ऐसे में अजपा जाप का अनुभव होने में, साधक को और भी अधिक समय लग सकता है। अजपा जाप एक तरह की ऐसी दहलीज़ है जिसे पार करने के बाद साधक आध्यात्मिक चेतना के अगले मार्ग की ओर प्रस्थान करता है।

इस अवस्था को पाने के लिए साधक को हर समय संजीवनी मन्त्र का मानसिक जाप करते रहना चाहिए, चलते फिरते, खाते पीते, नहाते धोते, गाड़ी चलाते हुए, खाना बनाते हुए आदि आदि। चूंकि ये मानसिक रूप से किया जाने वाला जाप है, इससे न तो साधक के क्रिया कलापों में कोई व्यवधान उत्पन्न होता है, और न ही ये साधक के आस पास के लोगों को कोई बाधा पहुँचाता है। जब मंत्र का मानसिक जाप समर्पित भाव से (न कि यांत्रिक तरीके से) किया जाता है तो साधक अपनी साधना के आरंभिक समय में ही अपने व्यक्तित्व में सार्थक या महत्त्वपूर्ण परिवर्तन महसूस करने लगता है।

  • गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में कहा है –

कलियुग केवल नाम आधारा, सुमरि सुमरि नर उतरहिं पारा”

  • नाम जप के विषय में नानकदेव जी ने भी कहा है कि –

भाँग धतूरा नानका उतर जाय परभात, नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात”

  • कबीर दास जी ने भी कहा है –

नाम अमल उतरे न भाई,और अमल छिन छिन चढ़ि उतरे,नाम अमल दिन बढे सवाया”

गुरुदेव सियाग ने इसीलिए कहा है कि संजीवनी मन्त्र का सतत जाप करते रहिये, तो आपको बिना नशा किये ही नशा चढ़ा रहेगा! ये राम के नाम का नशा है, इसके आगे और सभी नशे फीके पड़ जाते हैं।

  • संत कबीर ने मानव शरीर को पानी से भरे हुए एक मिट्टी के घड़े की संज्ञा दी है। उन्होंने कहा है कि –

जल विच कुम्भ, कुम्भ विच जल है, बाहर भीतर पानी। विघटा कुम्भ, जल जल ही समाना, ये गति विरले ने जानी।।”

भीतर भी पानी है, और बाहर भी पानी है, जब ये कुंभ या घड़े रुपी शरीर समाप्त होता है तो बाहर और भीतर का पानी एक जो जाता है। इस ‘एकात्म’ की पहचान गुरु कृपा से ही संभव है। ये शरीर जिसे हम इतना महत्त्व देते हैं, एक न एक दिन तो नष्ट होना ही है, यदि इसे दुबारा नहीं बनने देना चाहते तो फिर नाम ही जपो।

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