(hi) गुरु सियाग योग

Q 1 गुरुदेव सियाग सिद्ध योग की प्रारंभिक जानकारी क्या है?

Ans:

  • गुरु सियाग योग पूर्णतः निःशुल्क है।
  • कोई डाइरेक्ट या इंडाइरेक्ट रूप से दान या लेन देन नहीं |
  • कोई भेंट पूजा नहीं है|
  • किसी भी प्रकार का रजिस्ट्रेशन नहीं है|
  • कोई कोर्स या ट्रेनिंग सेशन नहीं है|
  • कुछ भी नहीं ख़रीदना है|
  • इस योग में किसी भी प्रकार का कर्मकाण्ड नहीं हैं।
  • मंत्र दीक्षा के लिए कहीं आना जाना नहीं है| मंत्र दीक्षा विडियो / आडियो सी.डी. से, टी.वी. से, ई- मेल से भी पूरी तरह कार्य करती है।
  • ध्यान के लिए किसी एकांत की ही ज़रूरत नहीं है| ध्यान घर, ऑफिस, गाड़ी आदि कहीं पर भी किया जा सकता है| ध्यान किसी भी दिशा में बैठकर कर सकते हैं|
  • इस साधना में किसी भी प्रकार की कसरत नहीं करवाई जाती है| वे क्रियाएं जो आप के शरीर के लिये आवश्यक हैं, वह ध्यान के दौरान कुण्डलिनी जागरण द्वारा स्वतः होंगी।
  • यह सभी धर्मों, जातियों, पंथों, वर्गों, सम्प्रदायों आदि के लिये है।
  • इस योग का सम्बन्ध किसी धर्म से नहीं है। जिस तरह गणित या विज्ञान या डॉक्टर का सम्बन्ध किसी धर्म से नहीं होता, उसी प्रकार गुरु सियाग योग भी अध्यात्म का एक विज्ञान है, यह सम्पूर्ण मानवता के लिए है।
  • कुन्डलिनी शक्ति मातृ-शक्ति होती है. जिस प्रकार माँ, कभी भी बच्चे का नुकसान न तो चाहेगी ओर ना ही होने देगी| इस योग को 5 वर्ष से लेकर किसी भी उम्र के व्यक्ति कर सकते हैं|
  • इस योग में किसी भी प्रकार कि योग या ध्यान से संबंधित पूर्व जानकारी आवश्यक नहीं है| जरूरत है तो केवल नियमित साधना की इच्छा-शक्ति की| जैसे सूर्य, बादल, हवा, पानी आदि – अनपढ़ और साइंटिस्ट, दोनों को समान लाभ देते हैं; किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते| इसी प्रकार गुरु सियाग योग में भी किसी पूर्व ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।
  • ध्यान आप किसी भी समय, जो आपको सुविधाजनक हो, कर सकते हैं।
  • ध्यान सुबह किसी भी समय जगने के बाद से दोपहर तक किसी भी समय और शाम से सोने तक कभी भी कर सकते हैं|
  • दिन के 24 घंटे में कम से कम दो बार (सुबह – शाम) अवश्य करना हैं। सुविधानुसार समय रोज बदल सकते हैं| ठंडे प्रदेशों में या कोई ज़्यादा परेशानी होने पर ध्यान अधिक समय तक या दो बार से अधिक भी किया जा सकता है।
  • केवल 15 मिनट के ध्यान लिए प्रार्थना करके ध्यान आरम्भ करना है। यदि समय अपने आप 15 मिनट से ज़्यादा हो जाता है तो भी चिंता ना करें। 15 मिनट से पहले आँखे ना खोलें| आरम्भ के दिनों में अलार्म लगाया जा सकता है।
  • आवश्यकता होने पर या किसी कारणवश आप ध्यान के बीच उठ सकते हैं। अपना कार्य समाप्त कर पुनः ध्यान के लिये बैठ सकते हैं।
  • आप फ़र्श, कुर्सी, सोफे या बिस्तर पर बैठकर ध्यान कर सकते हैं। आरम्भ में हो सके तो कोई सहारा ना लें। कई बार ध्यान के समय सिर या शरीर पीछे की तरफ जाना चाहता है, तो इस मूवमेंट में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। कई लोगों के अनुभव हैं कि जब वे सहारा लेकर बैठ कर ध्यान करते थे, तो सिर में भारीपन आ जाता था। आपका शरीर चारों ओर से मूवमेंट के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। वैसे किसी भी सुविधाजनक स्थिति में बैठ सकते हैं।
  • खाने-पीने, सिगरेट, शराब, तंबाकू आदि (शाकाहारी – मांसाहारी) का कोई बंधन नहीं है| कुछ भी छोड़ने की जरूरत नहीं है। मंत्र एवं ध्यान की शक्ति आपको उस वस्तु से अपने आप दूर कर देती है जो आप के शरीर के लिये हानिकारक है या जिनको आप छोड़ना चाहते हो। ध्यान व मंत्र में शक्ति होगी तो नुकसान करने वाली चीजें अपने आप छोड़ जाएँगी। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि सूरज, हवा, पानी, बादल, फूल आदि प्राकृतिक चीजें कभी कोई बंधन नहीं लगाती। आप चाहे मांस खाएं, शराब पीएं, अच्छा-बुरा करें, फिर भी सूरज, हवा, पानी, बादल, फूल आदि आपको किसी भी चीज से वंचित नहीं करते, तो फिर ईश्वरीय शक्ति आप पर बंधन क्यों लगायेगी? गुरु सियाग योग विधि में कुछ भी छोड़ने का बंधन नहीं है। (यदि किसी भी प्रकार का प्रश्न हो तो 9468623528 पर ह्वाट्सऐप या gssyworld@gmail.com पर मेल कीजिए)
  • महिलाएं इस ध्यान को महीने के तीसों दिन कर सकती हैं।
  • आपको अपने वर्तमान रहने के तरीके या दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं करना है और न आपको रहने का कोई नया तरीका अपनाना है। जो कुछ आप ध्यान आरम्भ करने से पहले कर रहे थे, उसे जारी रखें। यानी 24 घंटे में से 23 घंटा 30 मिनट आप चाहे जो करें बस कोई से 15 – 15 मिनट (सुबह और शाम) दो बार का ध्यान करना है|
  • ध्यान व मंत्र-जाप किसी दूसरे (जो स्वयं करने में अक्षम हो जैसे छोटे/नासमझ बच्चे) के लिए भी किया जा सकता है। उस व्यक्ति के लिये भी ध्यान कर सकते हैं जो आपके दिल के बहुत करीब हो, जिसके बारे में आप बहुत चिंता करते हैं। जो आपके अत्यधिक करीब हो, जिसको आप हृदय की गहराइयों से चाहते हों| ऐसे व्यक्ति आपके माता – पिता, भाई – बहिन, पति/पत्नी, रिश्तेदार, मित्र आदि कोई भी हो सकते हैं जिनसे आपका मजबूत आन्तरिक बंधन हो|
  • गुरुदेव ऐसा कभी नहीं कहते कि गुरु छोड़ दोगे तो पाप लगेगा। गुरु सियाग का कथन – कि मुझे छोड़कर किसी और को गुरु बना लो और तुम्हारा काम न हो तो फिर शुरू कर लेना। यानी ध्यान और मंत्र जाप पुनः शुरू कर देना। परिणाम आने लगेंगे।
  • मंत्र प्राप्त करने के बाद यदि कोई प्रश्न नहीं है – तो ध्यान करने के लिए किसी स्थान विशेष पर जाना या किसी केंद्र पर जाना या किसी के घर जाकर ध्यान करना या सामूहिक ध्यान करना या ऑनलाइन ध्यान करना आदि जैसा कोई बंधन नहीं है।
  • गुरु सेवा या गुरु भक्ति के नाम पर किसी स्थान विशेष पर साफ़-सफ़ाई या सेवा देना जैसा कोई बंधन नहीं है।
  • ध्यान, आप संभव हो तो अकेले ही या परिवार के साथ करिए।
  • गुरु सियाग योग में विपरीत असर कभी नहीं होते। लेकिन नियमित न करने से गुरु सियाग योग के फायदे आपको बहुत ही धीमी गति से अनुभव होंगे।

 

Q2. ईश्वर प्रत्यक्षानुभूति एवं साक्षात्कार का विषय है, कथा प्रवचन का नहीं है? आजकल आध्यात्मिकता के नाम पर कथा-प्रवचन होते ही नजर आते हैं।

Ans: भगवान, गॉड, अल्लाह आदि क्या हैं? कहाँ रहते हैं? कैसे मिलेंगे? आदि अनेक प्रश्न दिमाग में आते रहते हैं।इनका उत्तर पाने के लिए मंदिर, मस्जिद, चर्च जाकर या घर पर पूजा-पाठ इत्यादि करते रहते हैं। बचपन से देखते आए हैं कि दादा, पिता, माता आदि नियमित पूजा-पाठ, माला फेरना, व्रत-उपवास, कथाएँ सुनना, रामायण पाठ, हनुमान चालीसा, नमाज़, प्रेयर, माता की पूजा आदि करते आए हैं। इनके कहने पर एवं देखा – देखी हमने भी यह कार्य चालू कर दिए। परन्तु इतना करने के बाद भी भगवान के बारे में न तो पता चला और ना ही यह समझ आया कि क्या करें? प्राचीनकाल में अधिकांश मनुष्य विभिन्न दैवीय शक्तियों के स्वामी थे, जब कि शारीरिक रूप से वे हमारे समान ही थे। भूत-भविष्य की घटनाएँ देखना, सुनना, इच्छा मात्र से ध्यान, समाधि में चले जाना, सोचा हुआ घटित हो जाना आदि; ये कोई जादुई शक्तियाँ नहीं थी, ये उस काल के मनुष्यों की आन्तरिक दैवीय शक्ति, कुन्डलिनी शक्ति जागृत अवस्था मेंहोने के कारण था। उस काल के लिए ये साधारण क्रियाएँ मात्र थी। इसके कई उदाहरण रामायण, महाभारत, कुरान, बाइबल, गीता आदि में मौजूद हैं। कुन्डलिनी हम सब में भी है, पर कलियुग के गुणधर्म के कारण सोई हुई है। इस कारण हम सब प्रकार की शक्तियों से हीन हो गए हैं। तामसिक शक्तियाँ सब ओर से हावी हो गयीं हैं। विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ भी, इन आन्तरिक शक्तियों की क्षीणता का परिणाम हैं।

हम लोग बैलगाड़ी से हवाई जहाजों में आ गए, कच्ची सड़कों से एक्सप्रेस वेज पर आ गए, चिट्ठी पत्री से वीडियो कॉलिंग पर आ गए| इस हिसाब से सुपर सतयुग आ जाना चाहिए, पर फिर कलियुग क्यों आ गया? मोरल वैल्यूज़ का पतन हो गया है| इस युग के उत्थान के लिए जन-बल व धन-बल जिन लोगों के पास है उन्हें भगवान से मतलब नहीं रहा| पाठ-पूजा का पैसे के बल पर केवल आडम्बर रह गया है| इस युग बदलाव के लिए केवल मन-बल ही रह गया है, जो केवल ध्यान योग के माध्यम से ही संभव है|

आज विभिन्न शारीरिक कसरतों को योग का नाम दिया जाता है, जब कि इस योग का, वैदिक दर्शन में वर्णित योग से कोई सम्बन्ध नहीं है। सिद्धयोग दर्शन में शरीर, ध्यान के दौरान, आवश्यकतानुसार अपने आप आसन एवं प्राणायाम करता है। आज के धर्माचार्य अतीत का गुणगान करते हुए त्रेता एवं द्वापर युग के कथा-प्रवचन सुनाते हैं। कुंडलिनी की केवल बातें करते हैं। इन कथा-प्रवचनों से, न तो सुनने वाले को और ना ही सुनाने वाले को ईश्वरीय शक्ति का अहसास हुआ है, इसे वे भली-भांति जानते हैं। कथा-प्रवचन करने वाले आपको कई प्रकार से डराते हैं। ईश्वर के नाम से तो भय दूर भागता है, और मनुष्य हर प्रकार के बंधन से मुक्त हो जाता है। पर इस समय पाप-पुण्य, स्वर्ग- नर्क रूपी काल्पनिक बन्धनों से बांधकर, भय से भगवान की अनुभूति करवाते हुए, मोक्ष को समझाने का असफल प्रयास किया जा रहा है।

समर्थ गुरु ईश्वर का साक्षात्कार एवं प्रत्यक्षानुभूति करवा देते हैं ना कि कथा, किस्से, कहानियां सुनाकर मनोरंजन करवाते हैं। जिस प्रकार पानी के बारे में केवल बातें करने से प्यास नहीं बुझती, उसी प्रकार कुण्डलिनी की बातें करना, पुरातन काल में हुई घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर जनता को हंसाना, मनघड़न्त किस्से-कहानियाँ सुनाना एवं मनोरंजन करवाने से ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति एवं साक्षात्कार नहीं होता या सुनने वाले को ईश्वरीय शक्ति का अहसास नहीं होता।

 

Q3. ध्यान व संजीवनी मंत्र क्या करता है?

Ans: अगर हमारी दोस्ती देश के पी.एम. से हो जाए तो हमारा कोई भी कार्य नहीं रुकेगा| जब एक भौतिक इंसान से कनेक्शन, जीवन की लगभग सभी परेशानियाँ मिटा सकता है तो सोचिए – ‘ऊपर वाले’ से कनेक्शन यानि दोस्ती हो जाए तो क्या कोई भी कार्य रुकेगा? ‘ऊपर वाले’ से इसी कनेक्शन के लिए हम सब लोग अपनी अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार, अपने अपने प्रार्थना केन्द्रों पर जाते हैं। कई बार लगता है कि ‘ऊपर वाला’ प्रार्थना सुनता है, कई बार लगता है कि नहीं सुनता है| प्रश्न ये भी उठता है कि प्रार्थना या पुकार हर समय, हर बार क्यूँ नहीं सुनी जाती? ऐसा क्यूँ होता है कि कुछ बातें बिना मांगे पूरी हो जाती हैं? कई बार लगता है कि ‘ऊपरवाला’’ परेशानी में भी नहीं सुन रहा| लोगों को कहते हुए भी सुना है कि बहुत प्रार्थना, पूजा-पाठ, इबादत, अरदास, प्रेयर, आदि करते हैं, पर ‘ऊपर वाला’ पता नहीं कहाँ है? सुनता ही नहीं| हम बहुत परेशान हैं, सब कुछ करके देख लिया, कुछ हो ही नहीं रहा।

एक छोटा बच्चा अपने पिता से जिद करके अपनी माँगे पूरी करवा लेता है या उसकी जिद देखकर पिता खुद ही उसकी डिमांड (मांग) पूरी कर देता हैं। पर जब हम अपनी किसी प्रार्थना को ऊपर वाले (परम पिता) से करते हैं तो वह पूरी क्यों नहीं होती? क्या ऊपर वाले में हमें देने की शक्ति नहीं है या फिर हमारी प्रार्थना ही ऊपर वाले तक नहीं पहुँच रही? अब ये तो है नहीं कि ऊपर वाले में देने की शक्ति नहीं है, हमारी प्रार्थना ही नहीं पहुंचती होंगी वरना ये कैसे सम्भव है कि ऊपर वाले (परम पिता) से हम कुछ मांगे और वो ना दे? मतलब हम उस ऊपर वाले की शक्ति से कनेक्ट नहीं हो पा रहे है; अब सवाल है कि ऊपर वाले की उस विशाल शक्ति से सम्पर्क कैसे करें?

आइये इसे भी एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें| आकाश में बिजली चमकती है वो लाखों वोल्ट की होती है, पर हम उससे घर का बल्ब नहीं जला सकते। इस आकाशीय बिजली से रोशनी तो होती है, पर ये रोशनी हमारी इच्छा से नहीं होती है| पावर हाउस में भी लाखों वोल्ट की बिजली बनती है, उस बिजली से हमारा पूरा घर प्रकाशित रहता है| आकाशीय बिजली से हमारा कोई कनेक्शन नहीं है, उससे रोशनी मिलती है पर हमारी मर्ज़ी से नहीं, या हम जहाँ चाहते हैं वहां नहीं| लेकिन वही बिजली पावर हाउस से तारों और ट्रांसफार्मर द्वारा नियंत्रित होकर आती है तो पूरे घर को प्रकाशित कर देती है|

इसी प्रकार हम सीधे ईश्वर की विशाल शक्ति से सम्पर्क नहीं बना पाते और ना ही हम डायरेक्ट ईश्वरीय शक्ति झेल सकते हैं | तो गुरुदेव के ध्यान का तरीका, हमारे व ईश्वरीय शक्ति के बीच एक तार (सम्पर्क) की भांति कार्य करता है। यही कारण है कि पहले, पूजा पाठ से जो समस्याएं नहीं मिटती थी, वे अब ध्यान के माध्यम से उसी ऊपर वाले द्वारा मिटने लगी हैं| यानी आपको देता वही है जिससे आज तक माँग रहे थे। हुआ यह कि अब मंत्र द्वारा आपका  कनेक्शन उस ऊपर वाले से हो जाता है। यानी आपको देगा वही भगवान जिसकी आप आज तक पूजा कर रहे हो, बस गुरु ने आपको उस अंदर वाले से जुड़ने के लिए तार दे दिया|

हम जिस की भी पूजा करते हैं वे सब आकाशीय बिजली के समान हैं, जो अपने हिसाब से कृपा करती हैं, हमारी मांग के आधार पर नहीं। यानि हमें भी ‘ऊपर वाले’ के साथ किसी कनेक्टिंग माध्यम की जरुरत है| इन शक्तियों से डायरेक्ट जुड़ने का तरीका हम लोग नहीं जानते| इन से जुड़ने के लिए हम लोगों को कनेक्टिंग तार की जरुरत है| ‘ध्यान’ वही कनेक्टिंग तार है। दुनियाँ के हर धर्म ने ध्यान को महत्व दिया है।

 

Q4. सही गुरु कैसे मिले?

Ans: ये आपको सोचना है, पर इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- पांचवी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं आदि की गणित पढ़ाने वाले सारे ही गुरु हैं, पर अगली कक्षा में जाते समय पिछली कक्षा वाले गुरु को छोड़ना होता है, एवं उसे धन्यवाद देना होता है कि – हे गुरु आपके दिए ज्ञान के कारण ही हम इस कक्षा को पास कर सके एवं अब अगली कक्षा में जा रहे हैं। अगर हम पिछली कक्षा के गुरु से ही चिपके रहेंगे तो अगली कक्षा में नहीं जा पायेगें| वैसे भी पिछली कक्षा का गुरु अगली कक्षा की सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता|

इसी प्रकार अध्यात्म में भी गुरुओं की अलग अलग स्टेज होती हैं| आध्यात्मिक गुरु यदि शिष्य की सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सके तो उसे शिष्य को अगले गुरु के पास जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए, शिष्य को डराना नहीं चाहिए, तभी वो सच्चा गुरु है| अगर कोई गुरु आपकी समस्याओं का समाधान नहीं कर सके तो उसको पकड़े रखने से कोई फायदा नहीं| आगे बढ़ने के लिए अगली सीढ़ी पर पैर रखना हो तो पिछली सीढ़ी से पैर हटाना होता है|

छत पर जाने के लिए कई सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं| उसी प्रकार आपने अब तक अध्यात्म में जो भी किया है, जो भी गुरु बनाये हैं, वो सब सीढ़ियाँ हैं जो आपको उच्चतम लक्ष्य यानी छत की ओर ले जाती हैं| इसी प्रकार यदि व्यक्ति की खोज निरंतर रहती है तो उसे कभी ना कभी ये संजीवनी मंत्र अवश्य मिल जाता है|

दैनिक जीवन में यदि डॉक्टर, किराना, ट्यूशन टीचर, पार्लर आदि संतुष्टि ना दे रहे हों तो उन्हें बदल देते हैं उसी प्रकार जीवन में बनाये गुरु से मनवांछित ना मिल रहा हो तो पिछले गुरु को प्रणाम करके आगे बढ़ने मैं कोई पाप नहीं है ॰ दत्तात्रेय जी ने भी २४ गुरु बनाये थे|

 

Q5. समर्थ गुरु सियाग का क्या अर्थ है?

Ans: ‘समर्थ गुरु’ का मतलब है जिनकी भौतिक उपस्थिति के बिना फोटो मात्र से भी दुनिया के किसी भी कोने में ध्यान लगता है, एवं कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है। समर्थ गुरु शिष्य पर किसी भी प्रकार का कर्मकांड का बंधन नहीं लगाते हैं। समर्थ गुरु सर्वव्यापी होता है| गुरु के बताए मार्ग पर चलने से ‘चेतन शक्ति’ अंदर से गाइड करती है |

जैसे अगर तार पतला या सही क्वालिटी का नहीं है तो भी बल्ब नहीं जलेगा या फ्यूज उड़ जायेगा, अर्थात तार भी सही क्वालिटी का होना चाहिए। इसी प्रकार गुरु भी समर्थ होना चाहिए। तभी वह ईश्वरीय  शक्ति का अहसास करा पायेगा। समर्थ का मतलब उपलब्ध या एनलाईटण्ड, सगुण साकार एवं निर्गुण निराकार, दोनों सिद्धियाँ प्राप्त, जिसके फोटो मात्र से भी दुनियाँ में कहीं भी ध्यान लगे, जो आपको हर प्रकार के बन्धनों या आडम्बर से मुक्त रखे, वही गुरु समर्थ कहलाता है। ये सब सामर्थ्य (गुण) गुरु सियाग विधि के मंत्र एवं ध्यान में हैं। समर्थ गुरु की बताई गई विधि भी विश्व के किसी भी कोने में बिना आए जाए या मिले परिणाम देती है।

गुरु सियाग को सगुण साकार (कृष्ण) एवं निर्गुण निराकार (गायत्री) की सिद्धि प्राप्त है, दोनों तरह की सिद्धियां एक ही जन्म में प्राप्त होने से, गुरुदेव के फोटो के ध्यान मात्र से भी कुण्डलिनी जागृत होती है। अन्य तरीके से ध्यान तो लगाता पर उस ध्यान से कुण्डलिनी जागरण नहीं होता|

 

Q6. गुरु सियाग योग को महायोग या सिद्धयोग क्यों कहा जाता है?

Ans: गुरु सियाग योग नाथ-मत के योगियों की देन है, इसमें सभी प्रकार के योग जैसे भक्तियोग, कर्मयोग, राजयोग, क्रियायोग, ज्ञानयोग, लययोग, भावयोग, हठयोग आदि सम्मिलित हैं, इसीलिए इसे पूर्ण योग या महायोग भी कहते हैं | योग के आठ अंगों यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि का बौद्धिक प्रयास से पालन करना अत्यंत जटिल है। परन्तु गुरू-शिष्य परम्परा में शक्तिपात-दीक्षा से कुण्डलिनी जागृत करने का सिद्धान्त है। जागृत कुण्डलिनी साधक को उपर्युक्त अष्टांगयोग की सभी साधनाएं स्वयं अपने अधीन करवाती है। ये योग स्वतः होता है।

गुरु सियाग योग सिद्धयोग या महायोग क्यूँ है? इसे एक उदाहरण से समझिए कि – मोबाइल के सिग्नल टावर के द्वारा सैटेलाइट से आते हैं| अगर टावर ना हो तो हमारा मोबाइल सिग्नल कैच नहीं करेगा| उसी प्रकार हम भी उसी मोबाइल की तरह हैं जिसे सेटेलाइट रूपी भगवान से कनेक्शन के लिए टावर चाहिए। गुरु हमको ध्यान व मंत्र रूपी विधि टावर के रूप में देता है, जिससे हम भगवान से कनेक्ट होने लगते हैं| यानी हमे भगवान की निरंतर उपस्थिति का अहसास होने लगता है| इसलिए ये ऐसा योग है, जो आपको आपके अंदर के भगवान से कनेक्ट कर देता है|

 

Q7. मंत्र गुरुदेव कि आवाज़ में ही क्यों कार्य करता है? लिखा हुआ पढ़ने से या किसी अन्य के बताने से कार्य क्यों नहीं करता?

Ans: गुरुदेव कि आवाज़ एक एनलाईटण्ड यानि उपलब्ध हुए या पूर्ण रूप से चेतन शरीर से आती है, इसलिए प्रभावी होती है। इसे आप एक उदाहरण से समझें। किसी राजा के राज्य की सीमा के बाहर एक महात्मा आया जो लोगों को “राम” नाम की दीक्षा देता था। मंत्री ने राजा को कहा कि महाराज आप भी उस महात्मा से राम नाम का मन्त्र ले लें। तो राजा ने कहा कि राम नाम तुमने बता तो दिया अब, महात्मा के पास जाने से क्या होगा?

अचानक थोड़ी देर बाद मंत्री सैनिकों से राजा की ओर इशारा करके बोला कि, “इन्हें गिरफ्तार कर लो”, पर कोई सैनिक नहीं हिला। मंत्री 10 बार चिल्ला-चिल्ला कर बोला कि इन्हें गिरफ्तार कर लो, पर सैनिकों में से एक भी नहीं हिला। राजा को बहुत तेज गुस्सा आया और सैनिकों से मंत्री की ओर इशारा करके बोला कि – “इन्हें गिरफ्तार कर लो”। सैनिकों ने तुरंत मंत्री को गिरफ्तार कर लिया। मंत्री बोला – महाराज, ‘इन्हें गिरफ्तार कर लो’ शब्द मैंने 10 बार बोला, चिल्ला-चिल्ला के बोला, पर एक भी सैनिक नहीं हिला। आपने एक ही बार बोला ‘इन्हें गिरफ्तार कर लो’, सैनिकों ने तुरंत मुझे गिरफ्तार कर लिया। आपने कुछ अतिरिक्त नहीं बोला और मैने कुछ कम नहीं बोला, तो फिर ऐसा अंतर क्यों? राजा बोला – क्योंकि मैं समर्थ हूँ, मैं राजा हूँ। इसलिए मेरा बोला हुआ शब्द प्रभावी है। तो मंत्री बोला – महाराज, यही तो मैं कह रहा था कि आप भौतिक समर्थ हैं तो तुरंत एक्शन हुआ। इसी प्रकार राज्य की सीमा पर आया महात्मा अध्यात्मिक रूप से समर्थ है, तो उसके मुँह से बोला हुआ “राम” काम करेगा, मेरे मुँह से सुनाया हुआ नहीं। राजा को तुरंत अपनी भूल का अहसास हो गया। इसी प्रकार गुरुदेव सियाग के मुख से सुना हुआ दिव्य-मन्त्र ही कार्य करता है। आप का बोला हुआ, लिख कर दिया हुआ मन्त्र प्रभावी नहीं होगा।

 

Q8. संजीवनी-मंत्र किस प्रकार कार्य करता है? मन्त्र किस प्रकार परिवर्तन लाता है?

Ans: अगर आप केवल ध्यान करते हैं तो आपकी समस्याओं का निदान या आध्यात्मिक विकास केवल ध्यान की अवधि के दौरान ही होगा। यानि प्रगति बहुत धीरे होगी। और अगर आपने मंत्र प्राप्त किया है एवं निरंतर मंत्र-जाप भी करते हैं तो प्रगति ध्यान के समय के अलावा मंत्र जाप करते-करते भी होती रहेगी। प्रगति की रफ्तार बहुत तेज हो जायेगी। आप शक्ति से निरंतर सम्पर्क में रहेंगे। जिस प्रकार बिजली के स्विच से उपकरण तक तार जुड़ा होने से उपकरण चलता रहता है उसी प्रकार निरंतर नाम-जप आपके अंदर के विकास को लगातार आगे बढ़ाता है। एवं उस नाम-जप के कारण शक्ति, ध्यान के समय के अलावा भी लगातार आपके साथ कार्य करती रहती है इसलिए हर परेशानी का जल्दी समाधान होता है।

दुनिया के सभी धर्मों में कितनी भी विभिन्नताएं हों पर एक बात पर सभी एकमत हैं कि इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक ‘दिव्य शब्द’ से हुई है। बाइबल भी कहती है कि सृष्टि के आरम्भ में ‘शब्द’ था, ‘शब्द’ ईश्वर के साथ था। ‘शब्द’ ईश्वर था। वह ‘शब्द’ ईश्वर के साथ आरम्भ हुआ था। हर वस्तु उसके द्वारा बनाई गई थी और उसके बिना कुछ भी बनाना सम्भव नहीं था।

ये आधारभूत या मूल ध्वनियों, जिनमे संबंध स्थापित करने की शक्ति निहित रहती है, मंत्र कहलाती हैं। ये गोपनीय  मंत्र गुरु द्वारा ही दिये जाते रहे हैं। मंत्र बहुत तरह के होते हैं। मनुष्य इनसे अनेक प्रकार की क्षमताएं प्राप्त कर सकता है – कुछ ऐसे मंत्र हैं जो घातक सिद्ध होते हैं (पांच मिनट के अंदर भयंकर वमन होने लगता है। ठीक-ठीक निशाना बनाकर वे शरीर के किसी भी भाग पर, किसी अंगविशेष पर प्रहार करते हैं, फिर रोग पैदा करने वाले, आग लगा देने वाले, रक्षा करने वाले,मोहिनी शक्ति डाल वश में करने वाले भी मंत्र होते हैं। इस तरह का जादू-टोना, निम्न स्तर से संचालित होता है।

किन्तु एक उच्चतर जादू जो कि होता है जो उच्च स्तर द्वारा संचालित एवं सिद्धध मंत्र जिनका कोई गुरु अपने शिष्य को, चेतना के किसी विशेष स्तर के साथ, किसी विशेष शक्ति अथवा दिव्य सत्ता के साथ, सीधा सम्बंध स्थापित करने के लिए सहायता करने के उद्देश्य से, प्रदान करता है। अनुभूति और सिद्धि कि शक्ति स्वयं इस ध्वनि (मंत्र) में ही विद्यमान रहती है यह ऐसी ध्वनि होती है जो हमें अंतदृष्टि प्रदान करती है।”

 

Q9. गुरु सियाग के भौतिक रूप से उपस्थित ना होने से क्या साधना पर कोई अंतर पड़ेगा? गुरुदेव से कनेक्शन कैसे होगा?

Ans: साधना में कोई अंतर नहीं आएगा| जैसा फायदा पहले हो रहा था बिलकुल वैसा ही होता रहेगा ।

  • समर्थ गुरु कभी नहीं मरते: कई वर्ष पहले गुरुदेव से किसी ने पूछा था कि जब गंगाईनाथजी गुरुदेव को मंत्र देकर ब्रह्मलीन हो गए तब गुरुदेव ने अपनी साधना को कैसे मैनेज किया? तब गुरुदेव ने उस शिष्य को कहा कि “गंगाईनाथजी तुम्हारे लिए मृत हो सकते हैं लेकिन मेरे लिए नहीं | मेरे लिए तो वो अजर अमर हैं | फिर गुरुदेव बोले: यद्यपि वो शरीर अब नहीं है पर अब भी गंगाईनाथजी मुझे निरंतर गाइड करते है।” गुरुदेव के इस कथन से स्पष्ट है कि गुरु की कृपा शरीर द्वारा नियंत्रित नहीं होती है। ये कृपा चेतना के उच्च स्तरों से आती है वही हमें मार्गदर्शन, सुरक्षा एवं भविष्य के लिए उत्साहवर्धन करती है | इसी प्रकार हम सभी के लिए भी गुरुदेव द्वारा बताया गया ध्यान एवं नाम जप का मार्ग उसी प्रकार शक्तिशाली रहेगा जैसा की पूर्व में रहा है। शक्ति साधकों को निरंतर गाइड करती रहेगी ।
  • मंत्र चेतन हैं (संजीवनी): गुरुदेव द्वारा दिया गया दिव्य मंत्र न केवल गुरुदेव द्वारा चेतन किया गया है बल्कि इस मंत्र को गुरुदेव के भी गुरुओं द्वारा चेतन किया गया है। प्रारम्भ के हर नाथ गुरु ने जीवन भर तपस्या करके उस मंत्र को और शक्तिशाली बनाया, फिर उसे योग्यतम चेतन शिष्य को दिया। फिर उस चेतन शिष्य ने जीवन भर उस मन्त्र को जपा एवं उसे और शक्तिशाली फिर उसे अगले शिष्य को दिया | इस प्रकार गुरुदेव द्वारा दिये गए मंत्र में अनेक गुरुओं की साधना की शक्ति भरी हुई है जिस कारण ये ‘संजीवनी मन्त्र’ है। गंगाईनाथजी के आदेश से, गुरुदेव सियाग ने इस मंत्र को किसी एक शिष्य तक ही सीमित ना रख कर मुक्त रूप पूरी मानवता को उपलब्ध करा दिया। शुरू में गुरुदेव सामूहिक दीक्षा समारोह में केवल गुरुवार को स्वयं उपस्थित होकर मंत्र देते थे | बाद में 2009 में गुरुदेव ने अपने शरीर की सीमाओं को समझते हुए एवं विश्व में बढ़ती हुई परेशानियों से लोगों को राहत प्रदान करने के लिए अपने शिष्यों को इलेक्ट्रोनिक मीडिया जैसे TV प्रसारण, यू ट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सअप आदि द्वारा प्रचार करने की अनुमति दी | लेकिन मंत्र ऑडियो केवल गुरुदेव की आवाज़ में ही काम करेगा| जिस प्रकार पीने वाला पानी का पाइप किसी भी मटेरियल  (प्लास्टिक, लोहे, सीमेंट आदि) का हो, महत्व उसमें से पीछे से बह कर आ रहे पानी का है | पाइप तो आज है कल गल जाएगा, उसी प्रकार गुरुदेव का कहना था कि मेरा शरीर आज है कल नहीं रहेगा पर, इससे आने वाली चेतन आवाज (संजीवनी मंत्रा) कभी नहीं मरेगी | उस आवाज़ को साथ रखो, वही कार्य करेगी |
  • गुरु आपके अंदर है: गुरु केवल वो ही नहीं है जो हम बाहरी रूप से देखते हैं | वह हम सभी में हैं। जैसा कि गुरुदेव ने बताया कि, “गुरु कौन है? ये शरीर गुरु नहीं है, ये शरीर तो किसी दिन नहीं रहेगा, पर गुरु (गुरुदेव की शक्ति) कभी नहीं मरता, वह अनंत एवं उम्र की सीमाओं के पार है। गुरु तो हर शिष्य की चेतनाओं के अंतः स्तर में विराजमान है। साधना के साथ साथ गुरु की शक्ति का आंतरिक अहसास बढ़ता जायेगा | हमारा योग विज्ञान समय एवं दूरी के पार है। गुरुदेव कहते हैं कि में आप में हूँ और आप मुझ में हो | तुम जब भी मुझे याद करोगे अपने अंदर पाओगे | यदि गुरु समर्थ है तो वह सर्वव्यापी होता है उसे समय व् दूरी की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता | वास्तव में तो कोई गुरु ना तो तुम्हें बाहर से कुछ दे सकता है और ना ही तुमसे कुछ ले सकता है। अगर कोई गुरु एसा दावा करता है तो वो केवल तुम्हें बहला रहा है। मंत्र-दीक्षा अंदर बैठे गुरु से परिचय करवा देती हूँ। उससे आगे दोस्ती करना हमारा काम है, जो ध्यान एवं नाम जप से ही सम्भव है ।”
  • गुरुदेव के फोटो से ध्यान लगता है: गुरु सियाग अद्वितीय हैं क्यों कि उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार सगुण (मूर्ति रूप) एवं निर्गुण (निराकार) दोनों में हुआ है। गुरु सियाग एक शरीर न होकर एक ऐसी दिव्य चेतनता हैं जो सर्वव्यापी है। कोई भी गुरु सियाग को मन से प्रार्थना करके उनके फोटो का ध्यान करता है तो उसको वही दिव्य अनुभव होते हैं जो गुरुदेव के सशरीर होते हुए होते । श्री अरविन्द ने कहा है कि यदि एक योगी एक ही जन्म में सगुण और निर्गुण दोनों सिद्धियाँ प्राप्त कर ले तो वह पूरी मानवता को संकट से मुक्ति दिला सकता है | यदि एक व्यक्ति में यह परिवर्तन संभव है तो पूरी मानवता में भी परिवर्तन संभव है ।
  • नए साधकों के दिव्य अनुभवः बहुत सारे भारतीय एवं विदेशी शिष्यों ने अपने कई दिव्य अनुभव बताये जबकि उनको गुरुदेव के भौतिक देह छोड़ने की जानकारी भी नहीं थी | इससे यह स्पष्ट होता है कि गुरुदेव के भौतिक रूप से उपस्थित न होने पर भी उन साधकों के अन्दर गुरुदेव की शक्ति कार्य कर रही है | गुरुदेव की कृपा एवं आशीर्वाद सुक्ष्म तल पर शिष्यों के साथ है।

 

Q10. इस ध्यान व जाप को समर्पित भाव से कैसे करें?

Ans: कई बार विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, तब मन कहता है कि विरोध का जवाब दिया जाये, विरोध का जवाब नहीं दिया, तो इसका मतलब हम गलती पर हैं और विरोधी सही हैं। ये हमारा अहंकार ही होता है जो विरोध का उत्तर न दिए जाने की स्थिति में अपमानित महसूस करता है| इस अपमान के आगे हम समर्पण की शक्ति को कम आंकते हुए स्वयं ही विरोध का पत्थर उठा लेते हैं| जबकि  इतना भरोसा होना चाहिए कि विरोध की चिंता किये बिना कार्य करते चलें, विरोध का जवाब देने की चिंता भी छोड़ दें | लेकिन कभी-कभी इतना धैर्य नहीं होता और मन विरोधियों को जवाब देने की दिशा में लग जाता है| जो ऊर्जा अच्छेकार्य में लगनी चाहिए वह विरोधियों का जवाब देने में लग जाती है।

अगर आप धैर्य रखेंगे तो कुछ समय बाद पाएंगे कि होने वाला विरोध भी आपके किसी बिगड़े काम को बना गया वरना वो कार्य सम्भव नहीं होता या यूँ कहें कि ऐसी स्थिति में धैर्य की परीक्षा भी हो जाती है कि हमारे मन में ऊपरवाले के प्रति कितना समर्पण है। हम किस स्तर तक शांत रहकर, स्वयं विरोध का पत्थर उठाये बिना रह सकते हैं। यदि हम विपरीत परिस्थितियों में भी, परेशानी या विरोध की चिंता किये बिना, पूर्ण समर्पण रखते हुए अपना कार्य कर पायें तो होने वाली परेशानियों एवं विरोधियों को भी धन्यवाददेने का मन करेगा कि उन्ही के कारण हमें अपने आपको, अपनेसमर्पण को परखने का मौका मिला| ऐसी परेशानी या विरोध के प्रति निर्विकार रह पाना साधना का ही हिस्सा है।

समर्पण! शक्ति हमसे क्या चाहती है ये तब पता लगना शुरू होता है जब हमारा समर्पण पूर्णतः हो जाये तो आने वाली हर परेशानी या विरोध को ईश्वरीय सत्ता अपने आप संभाल लेती है| इस बात को एक छोटे से दृष्टान्त से समझा जा सकता है। एक बार राजा अपने महल में भोजन ग्रहण कर रहे थे एवं रानी पास ही बैठी थी| राजा अचानक भोजन का कौर थाली में छोड़कर द्वार की ओर भाग कर गए फिर एकदम लौटे और पुनः भोजन करने लगे| रानी ने कारण पूछा तो राजा बोले – “बाहर एक निहत्थे आदमी को बहुत सारे लोग मिलकर पत्थर मार रहे थे, इसलिए उसकी रक्षा करने के लिए भागा ।”

रानी असमंजस में थी की राजा द्वार तक जाकर वापस क्यों लौट आये| इसलिए उन्होंने पुछा, “आप द्वार तक जाकर वापस क्यों लौट आये?  रक्षा क्यों नहीं की?” राजा बोले “जब मैं उसकी रक्षा करने के लिए द्वार तक पहुँचा, तब तक उस व्यक्ति ने ही स्वयं की रक्षा करने के लिए अपने हाथ में पत्थर उठा लिया था तो मैं वापस लौट आया। उसे मेरी रक्षा की कोई जरूरत नहीं थी।”

इस दृष्टान्त से यह पता चलता है की अगर हम शक्ति पर विश्वास करें तो हर संकट से बाहर निकालती है| लेकिन होता उल्टा है कि हम हमारी बुद्धि का प्रयोग कर उस संकट से स्वयं के प्रयास से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसा करने से हम असफल तो होते ही हैं साथ ही ईश्वरीय की कृपा से भी वंचित रह जाते हैं।

दुसरे रूप में इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि शक्ति हमसे क्या चाहती है? यदि किसी पुल के दोनों ओर के सपोर्ट स्थिर नहीं हैं तो पुल के बीच के हिस्से को रोकने या स्थिर रखने में बहुत तनाव आएगा| इसी प्रकार हमारे जीवन में तनाव के कारण को समझने का प्रयास करें, हमारा जन्म कब व् कहाँ होगा हमारे नियन्त्रण में नहीं है, हमारी मृत्यु कब होगी या कल सोकर जगेंगे या नहीं ये भी नियन्त्रण में नहीं है। तो जब जीवन के दोनों सिरे पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं है तो जीवन के बीच घटित होने वाली परिस्थितियों को बुद्धि द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास ही तनाव व् उससे होने वाली बीमारियों का कारण है|

हमें “गो विथ फ्लो” (समय के साथ बहना) होना चाहिए और किसी भी प्रकार की चिंता आने पर परिस्तिथियों का विरोध किये बिना सब कुछ चिंता छोड़कर केवल नाम जप करना चाहिए| और देखना चाहिए कि शक्ति उसी कार्य को किस प्रकार नियन्त्रण में लेकर संचालित करती है, जिस कार्य को हम अब तक शक्ति पर भरोसा ना कर दिमाग लगाकर असफल प्रयास कर रहे थे| मृत शरीर पानी में नहीं डूबता, क्यूँ कि वो पानी से विरोध नहीं करता, हाथ – पैर मारता हुआ आदमी डूब जाता है। उसी प्रकार यदि हम चिंता आते ही गुरुदेव से प्रार्थना करे कि आज तक परेशानी आने पर खूब दिमाग लगाया, पर मनवांछित सफलता नहीं मिल तो अब इस कार्य की लगाम आपको देता हूँ, और मंत्र जाप शुरू कर दें| फिर देखिये आपका वही कार्य उस शक्ति की सहायता से किस प्रकार सफल होता है। आप केवल धैर्यपूर्वक इंतजार करें| शक्ति आपसे परेशानी या चिंता आने पर केवल धैर्यपूर्वक नाम – जप चाहती है| उस समय जो अपने आप आ रहा है उसे स्वीकार करें और जो जा रहा है उसकी चिंता न करें| शक्ति पर छोड़ दे| शक्ति बस यही चाहती है।

 

Q11. गुरु सियाग के ध्यान के समय क्या-क्या अनुभव हो सकते हैं?

Ans:

  • बहुत से साधक स्वत: होने वाली यौगिक क्रियायें या शारीरिक हलचल महसूस करते हैं जैसे – कम्पन, हिलना डुलना, आगे या पीछे की ओर झुकना, इधर से उधर सिर का हिलना, पेट का आगे की ओर फूलना या अन्दर की ओर पिचकना, हाथोंकी अनियमित गति, फर्श पर दंडवत लेट जाना, ताली बजाना, हंसना, रोना, चिल्लाना आदि|
  • कई बार ध्यान के दौरान ऐसे हाव-भाव बनते हैं जैसे ईश्वर की आराधना कर रहे हों, कुछ को दिव्यतेज प्रकाश दिखलाई पड़ता है या सुगंध आती है अथवा ध्वनि या नाद सुनाई देता है। ऐसे दृश्य दिखलाई पड़ते हैं जो या तो पूर्व में घट चुके हैं या भविष्य में वह घटनायें घटित होंगी।
  • ध्यान के दौरान बहुत से साधकों को अत्यधिक खुशी एवं उल्लास का अनुभव होता है जो उन्होंने इसमें पूर्व पहले कभी अनुभव नहीं किया होता है। कईयों को शरीर के विभिन्न हिस्सों में कम्पन (वाइब्रेशन) महसूस होते हैं।
  • इस योग में ध्यान का प्रभाव भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर अलग-अलग होता है। कुछ साधकों को ध्यान में गुरुदेव सियाग अथवा अन्य कोई दिव्य सत्ता की तस्वीर दिखलाई पड़ती है।
  • साधक जैसे-जैसे ध्यान के रास्ते पर आगे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे, धीरे-धीरे खुमारी एवं समाधि जैसी अवस्था आती जाती है। ब्रह्मांड में हमारे चारों ओर जो सूक्ष्म शक्तियाँ क्रियाशील होती है, उन्हें इस अवस्था में साधक ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अनुभव किया जाना महसूस करना आरंभ कर देता है।

 

Q12. मैं जब ध्यान करता हूँ तब गुरुदेव का फोटो नहीं देखपाता, इससे मैं ध्यान में चिंतित हो जाता हूँ और फिर ध्यान नहीं लगता। क्या करूं?

Ans: जिस प्रकार आप किसी के भी बारे में सोचते हैं, उसी प्रकार गुरुदेव का फोटो भी सोचिये। आरम्भ में गुरुदेव का फोटो देखकर ध्यान एवं मंत्र जाप करें, फिर फोटो हट भी जाये तो चिंता ना करें, पर मंत्र जाप लगातार करते रहें। अगर मंत्र जाप लगाकर चल रहा है तो कई बार आपको ध्यान में भूत-भविष्य की घटनाएँ, या आपकी परेशानियों के हल भी दिख सकते है। इसलिए आप फोटो की चिंता ना करते हुए मंत्र जाप सघनता से करते रहें। फ़ोटो हटने पर पुनः लाने का प्रयास करें एवं आँखें ना खोलें।

 

Q13. मैं ध्यान करने बैठता हूँ पर मुझे लगता है कि मेराध्यान नहीं लगता, कोई मूवमेंट भी नहीं होता तो क्या मेरी साधना सही नहीं चल रही? या मैं कोई गलती कर रहा हूँ?

Ans:

  • अगर आप नियमित ध्यान एवं नाम-जाप करते हैं तो आपको ध्यान लगने या न लगने की चिंता नहीं करनी चाहिए | केवल मूवमेंट (योगिक क्रियाएँ) होना ही ध्यान लगने की निशानी नहीं है। योगिक क्रियाएँ शरीर की आवश्यकतानुसार होती हैं| भौतिक जीवन में दिखने वाले लाभ भी ध्यान व नाम-जप का ही परिणाम होते हैं| कई साधक सोचते हैं कि उनको कोई मूवमेंट नहीं हो रहा तो क्या उनका ध्यान नहीं लग रहा?
  • कई बार दूसरों जैसे अनुभव महसूस करने की इच्छा मूवमेंट होने की इच्छा रखना भ्रमित कर सकता है| इसे उदाहरण से समझें – मिस्टर एक्स को 104 डिग्री बुख़ार है और मिस्टर वाई को 99 डिग्री। डॉक्टर ने दोनों को एक जैसी दवाई दी| कुछ समय बाद मिस्टर एक्स का बुखार उतरकर 98.6 डिग्री हो जाएगा|
  • सिद्धयोग का साधक जब कुछ समय तक नियमित रूप से ध्यान करता रहता है तो वह प्रत्यक्ष धनात्मक परिवर्तन पाता है। लम्बे समय तक चलने वाली परेशानियों तथा बीमारियों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होना आरम्भ हो जाता है और स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि वह यह महसूस करने लगता है कि जिस दर्द एवं परेशानियों ने वर्षों तक उसे परेशान कर रखा था उनसे वह पूर्ण रूप से मुक्त हो गया है। इसी प्रकार जो लोग नशे या शराब के आदी हैं अथवा विभिन्न प्रकार की मानसिक समस्याओं जैसे स्कीजोफ्रेनियां, भय, तनाव, अनिद्रा आदि से पीडत हैं, मुक्त हो जाते हैं। जो स्वस्थ हैं, वह आध्यात्मिकता के मार्ग पर तेजी के साथ प्रगति करते हैं।

 

Q14. क्या गुरुदेव से मंत्र लेते ही मेरी बीमारी ठीक हो जाएगी?

Ans: केवल मंत्र ले लेना ही पर्याप्त नहीं है। मंत्र का निरंतर मानसिक जप एवं ध्यान करना पड़ेगा| जल्दी फायदा होने के लिए नियमित ध्यान (बिना मिस किये) एवं मंत्र जप (अधिकतम सम्भव) करना पड़ेगा | यह एक अध्यात्मिक विधि है, कोई एक दिन में होने वाला जादू नहीं है| ये विधि शरीर को सहज रूप में ठीक करती है| धैर्य रखना चाहिए, परिणाम साधना के अनुसार आते है| डिप्रेस न होकर धैर्यपूर्वक नियमित साधना करनी चाहिए ।

कुछ शिष्यों ने बीमारी से बहुत जल्दी ठीक होकर, कुछ ही दिनों में बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किये | ये वो थे जिन्होंने किसी भी प्रकार की चिंता किये बिना केवल और केवल ध्यान, नामजप और ठीक होने के लिए प्रार्थना की |

 

Q15. चूंकि में गुरु सियाग साधना करता हूँ, तो क्या मैं डॉक्टर की बताई गई दवाई लेना जारी रखूं?

Ans: दवाई बिल्कुल जारी रखनी है – कभी भी मेडिकल इलाज या दवाइयों के लिए मना नहीं है। अंदर का डॉक्टर और बाहर का डॉक्टर दोनों मिल जाए तो बीमारी बहुत जल्दी ठीक होगी। योग की इस विधि के लिए समर्पण होना चाहिए, दवाई भी गुरुदेव से प्रार्थना करके प्रसाद के रूप में लें। ये अन्दर के डॉक्टर को चेतन करने की विधि है। एक डॉक्टर अन्दर भी बैठा है, वो अंदर से गाइड करेगा। उसके पास देने को बहुत कुछ है। ये ध्यान एवं मंत्र जाप हमारा परिचय उस अंदर वाले से करवा देगा। उस अन्दर वाले से दोस्ती करना हमारा काम है

 

Q16. मैंने दीक्षा ली, सिद्धयोग अपनाया और बीमारी से ठीक हो गया,अब मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ। मैंने ध्यान करना बन्द कर दिया है क्या मेरी बीमारी वापस आ आयेगी?

Ans: अधिकांशतः पाया है कि जो ठीक हो जाने के बाद ध्यान करना बन्द कर देते हैं, या जिनका विश्वास लुप्त हो जाता है पुनः उस रोग के शिकार हो सकते हैं लेकिन यह सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता। गुरु सियाग सिद्धयोग आपके पूर्ण विकास के लिए है, न कि केवल बीमारी ठीक करने के लिए। इसलिए बीमारी ठीक होने के बाद भी आप इसे नियमित रूप से करते रहें । जैसे ब्रश करके दाँत स्वस्थ हो जाते हैं फिर भी नियमित करते रहते हैं।

 

Q17. ज्यादा बीमार लोगों को कोई इस साधना में किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि वे जल्दी स्वस्थ हो सकें?

Ans: भारतीय योग दर्शन कहता है कि ऐसा कोई रोग नहीं है जो ठीक न हो सके। गुरुदेव द्वारा जो मंत्र दिया जाता है वह संजीवनी मंत्र है जिसका मतलब है कि यदि कोई बिलकुल मौत के किनारे पर पहुँच चुका है और पूर्ण विश्वास के साथ मंत्र जाप एवं ध्यान करना शुरू कर देता है, तो वह रोगमुक्त हो सकता है।

  • दिनचर्या में कोई परिवर्तन किये बिना चौबीसों घन्टे (अधिकाधिक समय) मंत्र जाप एवं दिन में कम से कम दो बार ध्यान करना चाहिए।
  • व्यक्ति जितना ज्यादा मंत्र जाप कोन्सियसनेस व समर्पण के साथ करेगा उतनी ही तेजी के साथ वह रोग मुक्त होगा। ध्यान के दौरान साधक को गुरुदेव से रोगमुक्ति हेतु प्रार्थना करनी चाहिए।
  • धागा, ताबीज या अन्य कोई ऐसी चीजें जो जादू टोने से सम्बन्ध रखती हों, नहीं पहननी चाहिए।
  • किसी भी प्रकार के धागे लच्छे, अंगूठी आदि जो किसी के कहने पर पहने हो, वो सब निकाल देनी चाहिए।
  • पूर्ण ठीक होने तक गुरुदेव के द्वारा दिये गये मंत्र के अलावा किसी अन्य मंत्र का जाप नहीं करना चाहिए। जैसे एक समय में एक डॉक्टर का इलाज ही लिया जाता है।
  • इस दौरान बाहर का प्रसाद या अनजान लोगों से कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहिए।
  • औषधि प्रार्थना करके प्रसाद के रूप में लेते रहें।

 

Q18. मेरा मित्र नियमित रूप से गुरुदेव का ध्यान करता है उस पर किसी ने कुछ तंत्र-मंत्र किया हुआ है जो उसे परेशान करता है| ध्यान व नाम-जप के अलावा वह और किस बात का ध्यान रखे ताकि वह इस परेशानी से जल्दी से जल्दी मुक्ति पा सके?

Ans: आप एक बात का ध्यान रखें कि जिस दिन से आप ध्यान एवं नाम-जप आरम्भ करते हैं उसी दिन से आपको किसी की भी तांत्रिक क्रिया परेशान नहीं कर सकती| किसी का कुछ भी किया आप पर असर नहीं करेगा| किसी पर ऊपरी हवा होगी, वो भी छोड़कर चली जायेगी| भूत-प्रेत का असर भी नहीं होगा| अगर आप इन से पीड़ित हों, तो इतना जरूर ध्यान रखें कि –

  • शरीर पर कोई ताबीज, धागा, लच्छा, स्टोन आदि हो तो उन्हें शरीर से हटा दें|
  • किसी भी पंडित, ज्योतिष, तांत्रिक, फकीर आदि के चक्कर में न पड़ें|
  • घर में किसी का दिया भस्म, भभूत या अन्य कुछ हो तो उसे हटा दें|
  • पीड़ित व्यक्ति के सामने गुरुदेव की फोटो लगा दें|
  • बाहरी या अनजान लोगों से किसी भी प्रकार का प्रसाद ग्रहण नहीं करें| खाने-पीने की वस्तुओं के माध्यम से बाहरी शक्तियों द्वारा नुकसान पहुंचाने की सम्भावना अधिक होती है|

 

Q19. क्या मैं खाने के बाद ध्यान कर सकता हूँ, खा-पीकरकरने में क्या नुकसान है?

Ans: कोशिश करके भरे पेट ध्यान न करें। अधिकांश साधक नींद में या सुस्ती में आ जाते हैं। साधक को ध्यान के समय यदि प्राणायाम होने लगे या शीर्षासन लगे तो भरा पेट बहुत असुविधाजनक हो जायेगा।

 

Q20. क्या मैं दूसरे व्यक्तियों के साथ एक समूह में ध्यान कर सकता हूँ?

Ans:

  • कई बार सामूहिक ध्यान के बाद फायदा महसूस नहीं करते क्यों कि – सबकी ऊर्जा का लेवल अलग अलग होता है, अतः ऊर्जा के मिसमैच के कारण मन शांत नहीं होता| सामूहिक ध्यान के पश्चात साधक अपने अनुभव एक दूसरे के साथ बाँट सकते हैं। किसी के भी अनुभव अन्य के उत्साह वर्धन के लिए उपयोगी हो सकते हैं। पर साधना के आरंभ काल में आंतरिक अनुभव, मन के वहम ज़्यादा होते हैं| इस कारण नये साधक दिग्भ्रमित हो सकते हैं| फिर नए साधक भी ऐसे अनुभव आने की कल्पना करने लगते हैं|
  • कई साधक दूसरे की योगिक क्रियाओं को ध्यान लगने का मापदंड मान बैठ कर मायूसी अनुभव करते हैं| जब कि ध्यान लगने का मापदंड केवल योगिक मूवमेंट होना ही नहीं है|
  • किसी एक साधक की योगिक क्रियाएं, आवाज़ें निकलना, रोना, हँसना आदि दूसरे साधक जिसे आंतरिक शांत अनुभव हो रहे हैं, उसका ध्यान भंग कर देती हैं|
  • एक ही परिवार के सदस्य चाहें तो एक साथ ध्यान कर सकते हैं। वैसे ये अंदर की यात्रा है इसलिए अकेले ध्यान करना भी उचित है|

 

Q21. गुरुदेव राधा-कृष्ण का मंत्र देते हैं | तो क्या मुझे राधा-कृष्ण के मंदिर जाना चाहिए?

Ans: गुरुदेव जब राधा-कृष्ण का मंत्र देते तब राधा से अर्थ है फीमेल-डिवाइन यानी कुन्डलिनी शक्ति एवं कृष्ण से अर्थ है मेल-डिवाइन यानी गुरुदेव स्वयं, अर्थात ब्रह्मांड की पुरुष शक्ति व कुन्डलिनी अर्थात मातृशक्ति।इसीलिए आज्ञाचक्र पर ध्यान करने से यानि पुरुष-शक्ति का ध्यान करने से, कुन्डलिनी यानि मातृशक्ति ऊपर उठने लगती है।अर्थात् आप राधा-कृष्ण के मंत्र को राधा-कृष्ण की पूजा के रूप में ना लें|

 

Q22. किसी अन्य गुरु का मंत्र भी साथ-साथ करते रहे तो कोई नुकसान है क्या?

Ans: उत्तर – नुकसान नहीं तो मनवांछित फायदा भी नहीं होगा। जैसेआपको किसी डॉक्टर का इलाज फायदा नहीं कर रहा है और आप किसी दूसरे डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाते हो | नया डॉक्टर आपको दवाई लिखता है और अगर आप उस दवा के साथ पिछले डॉक्टर की दवाई भी लेते रहोगे तो या तो आपको रिएक्शन या नुकसान होगा, और नहीं हुआ तो फायदा भी नहीं होगा | इसलिए उचित होगा कि मिक्सिंग ना करें॰

 

Q23. गुरुदेव का ध्यान आज्ञा चक्र पर करते हैं तो कुन्डलिनी जागरण से आज्ञा चक्र चेतन होता है। पर बाकी के चक्रों का क्या होगा?

Ans: पहले के युगों में साधना के अलग प्रकार थे, एवं हर चक्र को पार करने के लिए साधना करनी होती थी| इस कलियुग में गुरुदेव ने साधना को बहुत ही सरल बना दिया है। केवल ध्यान व नाम-जप से ही उद्धार हो रहा है। गुरुदेव आज्ञा चक्र पर ध्यान करने के लिए कहते हैं, इस प्रकार नीचे के चक्र ध्यान एवं नाम जप से (गुरुदेव की शक्ति से) अपने आप चेतन होते जाते हैं, जिनकी चिंता आपको नहीं करनी है। कई बार आपको बहुत अच्छे विचित्र अनुभव होते हैं, या होने वाली घटनाओं का आभास होने लगता है, दूसरों के विचार जानने लगते हैं, आपका सोचा या बोला हुआ घटित होने लगता है। ऐसा विभिन्न चक्रों के चेतन होने से जुड़ी हुई सिद्धियों के कारण होता है पर आपको इनमें उलझना नहीं है, इनमें उलझने का लालच आगे की आध्यात्मिक यात्रा में रुकावट पैदा करता है। इन सिद्धियों के लालच में नहीं उलड़ाना है। ये मार्ग में आने वाले चांदी, सोने, या हीरे के टुकड़ों के समान हैं जिनके लालच में उलझ कर आगे की यात्रा रुक जाती है।

 

Q24. क्या मैं किसी को भी गुरु सियाग सिद्धयोग के बारे में स्वयं बता सकता हूँ? क्या ये कॉपीराइट है?

Ans: कोई कॉपीराइट नही है, आप किसी को भी गुरु सियाग के योग के बारे में बता सकते हैं| इस ज्ञान के बार में तो आप जितने ज्यादा लोगों को बताएँगे उतना ही अच्छा है। दूसरों को बताने या प्रचार करने के लिए आपको किसी से आज्ञा लेने कि जरूरत नहीं है| आप पूरी दुनिया में स्वयं के खर्च पर या स्वयं की व्यवस्थाओं के आधार पर कहीं भी प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं| ये ज्ञान मुफ्त है। आपको भी आगे इसे मुफ्त ही बाँटना है।

 

Q25. मैंने गुरू सियाग से मंत्र प्राप्त कर लिया है लेकिन मेरी पत्नी/ पुत्र/पुत्री/ माँ / पिता आदि ने नहीं। क्या मैं उन्हें मंत्र बता सकता हूँ?

Ans: स्वयं के मुँह से बोलकर नहीं बतायें। गुरुदेव की आवाज़ का मंत्र का वीडियो या ऑडियो क्लिप दिखा या सुना सकते हैं। व्हाट्सऐप (9468623528) या ईमेल gssyworld@gmail द्वारा मंगवा कर सुनवा सकते हैं। स्वयं के मुख से बताने पर ये मंत्र सुनने वाले और सुनाने वाले, दोनों के किए कार्य नहीं करेगा। गुरुदेव की आवाज़ एक एनलाईटण्ड (उपलब्धहुआ) शरीर से आती है, इसलिए सुनने वाले के लिए कार्य करती है। किसी भी तरीके से मंत्र लें, मंत्र हमेशा सबके लिए एक ही रहेगा।

 

Q26. सुबह-शाम के ध्यान के अलावा बाकी समय इस साधना पद्धति का अधिकतम लाभ लेने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? या जब में ध्यान न कर रहा होऊँ तब मुझे क्या करना चाहिए?

Ans: आप गुरू सियाग द्वारा दिये गये मंत्र का जाप चौबीसों घन्टे (अर्थात अधिक से अधिक) करें। जाप इस रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ने की चाबी है। मंत्र जप काम करते, खाते-पीते, घूमते-फिरते, नहाते-धोते, ड्राइविंग करते, फ्रेश होते, मतलब तीसों दिन हर समय, कहीं भी किया जा सकता है। जितना ज्यादा मंत्र जाप करेंगे, उतना ही जल्दी आपकी समस्या का हल होगा। जब भी परेशानी आए, मंत्र-जाप तीव्र कर दें। आपके सोचने या चिंता करने से परेशानी का हल देर से निकलेगा, प्रार्थना एवं मंत्र जाप से परेशानी का हल जल्दी निकलेगा।

 

Q27. गुरु सियाग सिद्धयोग में ध्यान के समय अलग-अलग अनुभव क्यों होते हैं?

Ans: जिस प्रकार हर इंसान के फिंगर प्रिंट्स या आखों की आईरिस अलग अलग होती हैं, उसी प्रकार यह क्रियाएँ हर साधक के लिए उसके शरीर की आवश्यकतानुसार एवं प्रारब्ध के अनुसार अलग-अलग होती हैं। साधक को शारीरिक एवं मानसिक रोगों से छुटकारा दिलाने एवं उसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिये विशेष मुद्रायें /क्रियायें अपने आप होती हैं। इस कारण सिद्धयोग में योगिक मुद्रायें, अन्य योग संस्थाओं में इच्छानुसार वांछित प्रभाव लाने के लिये किसी क्रम विशेष में व्यवस्थित विधि द्वारा कराई जाने वाली योगिक क्रियाओं के अनुसार नहीं होती हैं।

 

Q28. ध्यान के समय कुछ लोग बहुत जोर से चीखते हैं, क्यों?

Ans: इसके कई कारण हो सकते हैं –

  • व्यक्ति को गले की समस्या हो सकती है। जिसे उस तरीक़े से ठीक होना है ॰
  • प्राणायाम का एक प्रकार हो सकता है,
  • कई लोग परिस्थितियोंवश अपनी भावनाओं को दबाकर रखते हैं, जो ध्यान के समय अपने आप प्रकट होती हैं। इनमें से कई लोग बाद मे बताते हैं कि उन्हें बहुत हल्कापन महसूस हो रहा है।
  • कुछ लोग बताते हैं कि उनके अंदर कोई ऊपरी हवा (बुरी शक्ति, भूत- प्रेत या आत्मा) होती है, जो ध्यान करते समय परेशान करती है क्योंकि उसे उस व्यक्ति का शरीर छोड़ना पड़ता है।इसको इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि- कुछ किरायेदार बड़ी शांति से रहते हैं, पर जब उन्हें मकान खाली करने के लिए कहा जाता है तो वे कोई न कोई उपद्रव मचाते हैं एवं आसानी से मकान खाली नहीं करते। इसी प्रकार ये ऊपरी शक्तियाँ आराम से शरीरों के माध्यम से अपनी इच्छाएँ पूरी करती रहती हैं।पर गुरुदेव के फोटो के सामने उन्हें वो शरीर छोड़ कर जाना होता है, तो वे उपद्रव मचाती हैं। उस संघर्ष एवं विरोध के कारण चीख-चिल्लाहट होती है।
  • इस बात को इस तरह भी समझा जा सकता है कि कई बार व्यक्ति ऐसा व्यवहार कर जाता है, जो उसे स्वयं समझ में नहीं आता कि उसने ऐसा क्यों किया एवं वो उसके लिए बाद में पछताता भी है। कई बार अचानक क्रोध में आकर गलत निर्णय ले लेता है, फिर कहता है पता नहीं मुझे क्या हो गया था? तो ये कई बार उस व्यक्ति में प्रविष्ट ऊपरी बाहरी ताकतों के कारण भी हो हो सकता है।

 

Q29. ध्यान के दौरान कुन्डलिनी जागरण से शरीर अपने आप योगिक क्रियाएँ करता है? ये क्या है? कई बार दूसरे साधकों की योगिक क्रिया देख कर भय लगता है कि आगे क्या होगा? अपने आप नहीं रुकी तो क्या होगा?

Ans: आरम्भ करने वाला कभी-कभी स्वैच्छिक होने वाली योगिक क्रियाओं से यह सोचकर साधक भयभीत हो जाता है कि, या तो कुछ गलत हो गया है या फिर किसी अदृश्य शक्ति की पकड़ में आ गया है लेकिन यह भय निराधार है। वास्तव में यह योगिक क्रियायें या शारीरिक हलचलें गुरुदेव कि दिव्य शक्ति द्वारा नियंत्रित हैं और प्रत्येक साधक के लिये भिन्न-भिन्न होती हैं। ऐसा इस कारण होता है कि इस समय दिव्य शक्ति जो गुरू सियाग की आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से कार्य कर रही होती है वह यह भली भाँति जानती है कि साधक को शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्त करने के लिये क्या विशेष योगिक क्रियाएँ जैसे, आसन, बंध, प्राणायाम, मुद्रायें आवश्यक हैं। यह क्रियायें कोई भी हानि नहीं पहुँचाती | शरीर-शोधन के दौरान असाध्य रोगों सहित सभी तरह के शारीरिक एवं मानसिक रोगों से पूर्ण मुक्ति मिल जाती है यहां तक कि वंशानुगत रोग जैसे हीमोफिलिया से भी छुटकारा मिल जाता है। सभी तरह के नशे छूट जाते हैं।

साधक बढ़ा हुआ अन्तर्ज्ञान, भौतिक जगत के बाहर अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को अनुभव करना, अनिश्चित काल तक का भूत व भविष्य देख सकने की क्षमता आदि प्राप्त कर सकता है। आत्मसाक्षात्कार होने के पश्चात आगे चल कर साधक को सत्यता का भान हो जाता है जो उसे कर्म बन्धनों से मुक्त करता है और इस प्रकार कर्म बन्धनों के कट जाने से दुःखों का ही अन्त हो जाता है। कुण्डलिनी के सहस्रार में पहुँचने पर साधक की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण हो जाती है। इस अवस्था पर पहुँचने पर साधक को स्वयं के ब्रह्म होने का पूर्ण एहसास हो जाता है इसे ही “मोक्ष” कहते हैं। फिर भी यदि कोई साधक इन क्रियाओं से अत्यधिक भयभीत है तो वह इन्हें रोकने हेतु गुरू सियाग से प्रार्थना कर सकता है। प्रार्थना करने पर क्रियाएं रुक जायेंगी। वैसे आप ध्यान में बैठने से पहले जितनी देर के लिए गुरुदेव से ध्यान के समय की प्रार्थना करते हैं, ठीक उतने समय बाद वे योगिक क्रियाएं भी अपने आप रुक जाती हैं ।

 

Q30. एक सामान्य सा प्रश्न है कि कुण्डलिनी जागरण का संकेत शरीर में होने वाली योगिक क्रियाएँ हैं जैसे मूवमेंट, आसन, मुद्राएँ आदि | यदि ये अनुभव नहीं हुए हों तो कुण्डलिनी जागरण हुआ या नहीं? कैसे पता लगेगा?

Ans: ध्यान के दौरान योगिक क्रिया न होने पर कुण्डलिनी जागरण के संकेत कुछ भी संभव हैं।

  • हथेलियों या सिर के टॉप का ठंडा या गर्म होना| कुछ साधकों को रीढ़ की हड्डी में ठण्ड या गर्मी का अहसास होता है।
  • ध्यान के दौरान प्रकाश या रंगों का दिखना या कोई दिव्य घटना दिखना|
  • किसी व्यक्ति या घटना के बारे पूर्व अहसास होना या साधक को किसी कार्य के बारे में कोई संकेत आना, और उसी अनुसार घटित होना|
  • अचानक बहुत आनंद या सबके लिए अत्यधिक प्रेम की अनुभूति होना| आसमान में उड़ने जैसी फीलिंग |
  • किसी का ध्यान के दौरान बहुत रोना एवं उसके बाद एसा महसूस होना कि जीवन भर का भरा हुआ दुःख आंसुओं के साथ बह गया हो ।
  • ध्यान में स्वयं का अत्यधिक फैलाव जैसे सब कुछ अपने में समा लिया हो या कहीं बहुत गहरे में जाने की अनुभूति|
  • ऐसी अनुभूति होना जैसे छोटे होते होते किसी दिव्य बिंदु में परिवर्तित होने की अनुभूति। इत्यादि

वे साधक जिनको कोई भी अनुभूति नहीं होती वे जीवन में बहुत अच्छे बदलाव पाते हैं,जैसे –

  • निरंतर नाम जप व ध्यान से वृत्तियों में बदलाव आता है, जैसे खाने की आदतों में बदलाव आना, नशों के ग्रहण ना करने की इच्छा, हल्का भोजन खाने की इच्छा।
  • सामाजिक जिन्दगी या सम्बन्धों में बदलाव आना। बिना ज्यादा कोशिश किये बुरी सोहबत का अपने आप छूटना।स्वयम की मौजूदगी से आस पास के वातावरण में बदलाव महसूस करना|
  • साधना में आगे बढ़ने के साथ आन्तरिक ऊर्जा नकारात्मक सोच को दूर करने लगती है। साधक को ऐसे लोग मिलने लगते हैं जो उसकी अध्यात्मिक प्रगति में सहायक होते हैं।
  • साधक का व्यवहार बदलने लगता है, साधक अपने कार्यों व कमियों के प्रति अधिक सचेत होना आरम्भ हो जाता है। जैसे-जैसे चेतना बढ़ने लगती है, वैसे-वैसे गुस्सा आना कम होता जाता है। साधक को अपनी गलती समझ आने लगती है। सभी के प्रति प्रेम पूर्ण होने लगता है।
  • जिनको ध्यान के दौरान कुछ भी एहसास नहीं होता, न कोई योगिक क्रिया, न कोई फीलिंग, न रोना, न हँसना, नाही कोई दिव्य अनुभूति | ऐसे साधक कैसे जाने कि उनकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत है? किसी भी साधक के लिए बहुत महत्वपूर्ण है उसमे आने वाला बदलाव | यदि साधक में साधना के बाद भी उसके व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं आता है जैसा वो पहले था वैसा ही बना रहता है तो साधक को समझना चाहिए कि कुण्डलिनी जागरण नहीं हुआ है। साधना में या नियमितता में कहीं न कहीं कोई कमी है।

 

Q31. यहाँ उन कारणों को जानने की कोशिश करेंगे जो कुण्डलिनी जागरण में या साधना में बाधा डालते है?

Ans: गलत अभ्यास : कई लोग अनजाने में मंत्र का गलत उच्चारण करते हैं या मानसिक जाप के बजाय बोल के जपते हैं। सही उच्चारण एवं ध्वनी मन्त्र में सामर्थ्य देती है। यदि एक शब्द भी गलत है तो मंत्र का प्रभाव नहीं होगा।

नियमित साधना न करना : गुरु सियाग दो बार सुबह शाम 15 मिनट का ध्यान एवं अधिकतम मन्त्र जाप के लिए कहते हैं। कई साधक दोनों में से किसी एक को छोड़ देते हैं, या 15 मिनट का ध्यान नहीं करते हैं, या ध्यान एक ही समय करते हैं या मंत्र जाप नहीं करते| मंत्र जाप केवल ध्यान के समय करते है एवं बाकी समय मंत्र जाप नहीं करते| जबकि मंत्र जाप कुण्डलिनी जागरण की चाबी है। यदि आप पर्याप्त मंत्र जाप नहीं करेंगे तो साधना के परिणाम जल्दी नहीं आयेंगे | उसी प्रकार ध्यान में भी लापरवाही परिणाम नहीं लाएगी|

अपने आप को धोखे में रखना : इस साधना विधि में स्वयं से ईमानदारी और स्पष्ट होना बहुत जरुरी है। अधिकतर साधक ये स्वीकार नहीं करते हैं कि वे साधना के प्रति नियमित नहीं हैं तथा वे GSY की साधना विधि में कमी खोजने लगते हैं। या सब कुछ गुरुदेव की इच्छा पर डालने लगते हैं। ये बहुत हानिकारक व्यवहार है, इसका मतलब ये भी है कि साधक विकास के लिए स्वयं की जिम्मेदारी लेने के बजाय सब चीजों की जिम्मेदारी योग विधि पर डाल कर स्वयं को मुक्त रखना चाहता है| ऐसे साधक पूरी तरह भरोसा या डिवोशन दिखाए बिना इधर–उधर भटकते हैं।

पूर्व ज्ञान की अधिकता :  कई व्यक्ति अपने पूर्व ज्ञान योग दर्शन, तंत्र विज्ञान, अन्य ध्यान तकनीके, चक्र, या अन्य प्रचलित विधियों के ज्ञान से भरे हुए होते हैं, और उस ज्ञान को गुरुदेव की साधना से जोड़ने का असफल प्रयास करते हैं। पिछले भौतिक ज्ञान से या अपने बनाए गोल सेट कर लेते हैं और उसी पूर्व ज्ञान के और साधना की विधी में दोष तलाश करने लगते हैं। इस कारण उन व्यक्तियों के लिए इस साधना व भौतिक ज्ञान के कारण काफी बड़ा गैप हो जाता है और वो ध्यान की विधि से भटक जाते हैं। वो कुछ विशेष अनुभवों को छांट कर चुन लेते हैं और उसी अनुसार परिणाम पाने की इच्छा रखते हैं। फिर उस पूर्व निर्धारित परिणाम प्राप्त नहीं होने पर शंकालु हो जाते हैं एवं साधना के कारण होने वाले परिणामों को महसूस नहीं कर पाते| फिर साधना की विधि में दोष तलाशने लगते हैं। ये योग बहुत ही आसन एवं सीधा है। लोग पूर्व ज्ञान के चक्कर में अपने को ही उलझा कर रखते हैं।

 

Q32. गुरु सियाग के सिद्धयोग में मुझे कैसे मालूम होगा कि मेरी कुण्डलिनी जागृत हो गई है?

ये आप स्वयं महसूस करने लगेंगे | स्वतः होने वाली योगिक क्रियाएं, दृश्य दिखना, बीमारियों का ठीक होना, व्यक्तित्व में धनात्मक परिवर्तन, इत्यादि कुछ लक्षण हैं जिनसे पता लगेगा कि कुण्डलिनी जागरण की ओर है । फिर भी कुन्डलिनी के जागने की चिंता भी छोड़ दें | आप निमित ध्यान व अधिकतम मंत्र जाप करें। आप पर कृपा ना हो? ये कैसे सम्भव है? ये कुछ इस तरह होगा कि दाल में नमक डालें और नमक का स्वाद ना आये |

 

Q33. मानसिक जाप करते समय किन बातों का ध्यान रखे तथा जाप करने को याद रखने के क्या तरीके हो सकते हैं ?

ध्यान रखने योग्य बातें – 

Ans: निरंतर मानसिक जाप : आपने गुरुदेव को स्पीच आपने कई बार सुना होगा कि दिव्य मन्त्र को राउंड दि क्लोक जपना है। इसका क्या मतलब है? 24 घंटे जाप करना कैसे संभव है?  यदि आप 24 घंटे जपोगे तो सोवोगे कब? या सोते समय कैसे जपोगे?  इसका उत्तर है कि आप जब जाग रहे हैं तब अपनी दिनचर्या को करते हुए जैसे खाते हुए, ड्राइविंग करते हुए, नहाते हुए, चलते हुए, कसरत करते हुए, काम पर जाते समय, या आराम करते हुए आदि जितना ज्यादा संभव हो सके उतना अधिकतम जाप करें| यदि आप जागते हुए समय में गंभीरता से एवं निरंतर जाप करेंगे तो कुछ ही दिनों ये हफ्ते बाद मंत्र अपने आप जपा जाने लगता है यानि अजपा जाप होने लगता है| गुरु सियाग का कहना है कि जो मंत्र उन्होंने आपको दिया है वो मन से जपा जाये तो अप पाएंगे कि 15-20 दिनों बाद मन्त्र जाप अपने आप चलने लगता है। यहाँ तक कि रात में अचानक आँख खुलने पर आप पाएंगे कि आपके अंदर मंत्र चल रहा है| आपको एसा लगेगा कि आपको मंत्र जाप नहीं करना पड़ रहा है एवं वो जिम्मेदारी अंदर स्थित किसी अन्य ने लेली है।

काम करते हुए मन्त्र कैसे जपें अधिकतर साधकों की समस्या होती है कि जब काम पर होते हैं तब मन्त्र कैसे जपें? कंप्यूटर पर काम करते समय, प्रोजेक्ट लिखते समय, एकाउंट्स का काम करते समय, लोगों से बात करते समय, बच्चों को पढ़ाते समय आदि मंत्र जाप करना कैसे याद रखा जाये ? चूँकि 8 घंटे जॉब , 8 घंटे सोने में निकल जाते हैं तो बाकी बचे 8 घंटे में किस पर प्रकार मानसिक जाप प्रभावी रूप से किया जाये? तो बाकी बचे 8 घंटे जब ना तो सो रहे हैं और ना ही जॉब पर हैं तब बिना भूले मन्त्र जाप को सघन रूप से गम्भीरता से करना चाहिए| तो इस प्रकार जब मंत्र जाप जागते हुए फ्री घंटों में किया जाता है तो मंत्र जाप अपने आप होने लगता है। गुरु सियाग कहते हैं कि इस प्रकार मंत्र, अजपा बन जाता है| साधक जब इस प्रकार गम्भीर प्रयास करता है तो मानसिक जाप बिना प्रयास के अपने आप, यहाँ तक कि काम करते समय भी चलता रहता है। दिन में काम के दौरान 5-7 बार चेक कर लिया जाये कि मंत्र जपा जा रहा है या नहीं, तो पाएंगे कि मंत्र अंदर से अपने आप जपा रहा है।

जीभ या होठों का मूवमेंट : मन्त्र मन ही मन में बिना होठ या जीभ हिलाए जपा जाना चाहिए| जब आप किताब या न्यूज पेपर पढ़ते हैं तब केवल शब्दों पर आँखे घूमती हैं लेकिन होठ तथा जीभ शांत होती है। मंत्र भी उसी प्रकार जपना है| मन्त्र को मध्यम गति से जपें, ना ज्यादा फास्ट और ना ही बहुत धीरे| ज्यादा धीरे करने पर मन भटकेगा एवं ज्यादा तेज गति से करने पर मंत्र के शब्दों का उच्चारण सही नहीं होगा।

गुरुदेव की आवाज़ में मंत्र : गुरु सियाग द्वारा कही गयी गई स्पीच में कई साधक कन्फ्यूज हो गए| गुरु सियाग ने कहा कि “मेरी आवाज साथ रखो” कई साधकों ने इसका अर्थ निकाला कि मंत्र जाप गुरु सियाग की आवाज़ में ही किया जाना है, यानि मंत्र जाप के समय गुरुदेव की आवाज को मानसिक रूप से याद करना है। ये सही नहीं है, क्यों कि एसा करके एक बहुत ही साधारण अध्यात्मिक प्रैक्टिस, बिना बात के ही कठिन बन जाती है। गुरु सियाग का सीधा सा कहना है कि जब नए व्यक्ति को मंत्र दिया जाये वो सबसे पहले गुरु सियाग की आवाज़ में ही सुना जाना चाहिए| यानि आपको किसी को भी मंत्र जोर से बोलकर नहीं बताना है, गुरु सियाग की विडियो या ऑडियो क्लिप चलाकर मन्त्र सुनाना है।

 

Q34. आरम्भ में मानसिक जाप याद रखने के तरीके?

Ans:

  • यदि आध्यात्मिकता या ईश्वरीय अनुकम्पा से ठीक होने की प्रबल इच्छा है तो गुरु सियाग का मंत्र का अधिकतम जाप करना है| आपको समय मिलते ही मंत्र जाप को दुसरे दुनियादारी के कामों की तुलना में प्रमुखता देनी होगी| जैसे कि बहुत से लोग खाली समय में टीवी देखेंगे, विडियो गेम खेलेंगे, सोशियल मीडिया पर टाइम पास चेट करते रहेंगे, और उस समय मन्त्र जाप मन्त्र जाप बार बार याद आये।
  • दो या दो से अधिक लोग मन्त्र जाप कर रहे हो तो सब एक दुसरे को मंत्र के लिए याद लगते रहें ।
  • कोई एक चीज या शरीर पर कुछ पहना हुआ गहना आदि को “व्यक्तिगत रिमाइंडर” के रूप में सेट कर लिया जाय ताकि उस आइटम को देखते है मंत्र जाप करना याद आ जाय| एसा कोई भी स्थान या ऑब्जेक्ट देखते ही आपका मन्त्र जाप शुरू हो जायेगा|
  • गुरु सियाग का कहना है कि आप इस प्रकार का कोई भी उपाय मन्त्र जाप याद रखने के लिए अपना सकते हैं ।
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