1. व्यक्तित्व का विकास, आत्मविश्वास, याद्दाश्त एवं एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
2. शारीरिक बीमारी से मुक्ति संभव – नाम जप व ध्यान से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर साधक का ध्यान के दौरान, जो अंग बीमार है उस अंग की योगिक क्रियाएँ (जैसे प्राणायाम, मुद्रा, आसन, शरीर में कम्पन होना, हाथ-पैरों का हिलना, शरीर का आगे-पीछे झुकना आदि) करवाती है जिससे कुछ ही दिनों में वो अंग ठीक होने लगते हैं। निरन्तर जाप एवं ध्यान के दौरान लगने वाली खेचरी मुद्रा में साधक की जीभ स्वतः उलटकर तालू से चिपक जाती है, जिसके कारण सहखार में निरन्तर टपकने वाला दिव्ध रस (अमृत) साधक के शरीर में पहुंचकर साधक की रोग प्रतिरोधक शक्ति को अद्भुत रूप से बढ़ा देता है, जिससे साधक को असाध्य रोगों से मुक्ति मिल सकती है।
3, मानसिक चिंता, डिप्रेशन, तनाव से मुक्ति सम्भव – मानसिक चिंता या तनाव या आक्रोश का कोई भी कारण हो सकता है जैसे- नौकरी, शादी, पारिवारिक समस्या, आर्थिक समस्या, ऑफिस प्रॉब्लम, बच्चों से सम्बंधित समस्याएं, केस मुकदमा, तंत्र मंत्र आदि कुछ भी हो सकता है| नियमित ध्यान व नाम–जप कुछ ही दिनों में आपकी सहायता आरम्भ कर देगा| ध्यान में आपको आपकी समस्याओं का हल दिखने लगेगा, जिससे आपका तनाव व आक्रोश घटना शुरू हो जायेगा| समस्याओं का हल ध्यान में अचानक, या किसी व्यक्ति द्वारा, किसी के फोन द्वारा, किसी पुस्तक द्वारा, या किसी भी माध्यम से होने लगेगा| मनोवैज्ञानिक एवं भावनात्मक असंतुलन को दूर कर शरीर को पूर्ण स्वस्थ बनाता है|
4. लत या व्यसन से मुक्ति संभव – नियमित ध्यान व नामजप से मनुष्य कि वृत्तियों में परिवर्तन आ जाता है| निरंतर नाम जप से नाम का ऐसा नशा चढ़ा रहता है कि उन वस्तुओं का नशा लेने की जरूरत ही समाप्त हो जाती है| जिससे अखाद्य वस्तुएँ व नशे अपने आप छूट जाते हैं। नशा आप नहीं, आपके अंदर की तामसिक वृत्ति मांगती है| इस ध्यान से तामसिक वृत्ति, सात्विक वृत्ति में परिवर्तित हो जाती है एवं अवांछित या शरीर के लिए अनुपयोगी / हानिकारक वस्तु अपने आप छोड़ जाती है| “मनुष्य उन वस्तुओं को नहीं छोड़ता, वे वस्तुएँ उसे छोड़ कर चली जाती हैं।”
खाद्य-पदार्थ पर से मजबूरी जैसी निर्भरता अपने आप हट जायेगी और कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होगा। जैसे कोई भी मोटापा नहीं चाहता, पर खाने की लत (वास्तव में शरीर की डिमांड) नहीं छूटती, तो ये ध्यान व नाम- जप अपने आप वज़न घटाने में मदद करने लगेगा| खाना-पीना अपने आप कंट्रोल होने लगेगा। ऐसी कोई भी लत / व्यसन जिसे आप छोड़ना चाहते हैं, इस ध्यान व जप से, स्वतः छूट जायेगी|
आज विश्व में तनाव व्याप्त है। अतः मनोरोगियों की संख्या सर्वाधिक है, खासतौर से पश्चिमी जगत में। भौतिक विज्ञान के पास मानसिक तनाव शान्त करने की कोई कारगर विधि नहीं है। भौतिक विज्ञानी मात्र नशे के सहारे, मानव के दिमाग को शान्त करने का असफल प्रयास कर रहे हैं। दवाई का नशा उतरते ही तनाव पहले जैसा ही रहता है. तथा उससे सम्बन्धित रोग यथावत रहते हैं। वैदिक मनोविज्ञान अर्थात अध्यात्म विज्ञान, मानसिक तनाव को शान्त करने की क्रियात्मक विधि बताता है। भौतिक विज्ञान की तरह भारतीय योग दर्शन भी “नशे” को पूर्ण उपचार मानता है, परन्तु वह “नशा” ईश्वर के नाम का होना चाहिये, किसी भौतिक पदार्थ का नहीं। इस युग का मानव भौतिक सुख को ही आनन्द मानता, यह भारी भूल है।
5. विद्यार्थियों को फायदे – बचपन ही ऐसा समय होता है कि जब बच्चों पर कोई जिम्मेदारी नहीं होती और बच्चों को अपना बचपन एन्जॉय करना चाहिए, अक्सर बड़ों की सोच बच्चों के एसी होती है। पर ये आंशिक सच है। निश्चित रूप से बच्चों में इतनी समझ नहीं होती कि वे अपने एक्शन (किये हुए) के परिणाम समझ पायें या भविष्य में उनका क्या होगा ? पर बच्चों की अपनी समस्याएं होती हैं जैसे: पढ़ाई की चिंता, स्कूल की चिंता, बड़ों का उनके प्रति व्यवहार, सामाजिक वातावरण एवं उम्मीदें, शरीर के प्रति चिंता (रंग-रूप की), आदि आदि | इस प्रकार के तनाव, बच्चे के व्यवहार को, खाने-पीने की आदतों को, शारीरिक वृद्धि को, स्वास्थ्य को, स्कूल में पढ़ाई व व्यवहार को, एवं दुसरे बच्चों से आदान-प्रदान आदि को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं ।
गुरु सियाग का योग इस प्रकार के तनावों से होने वाले नकारात्मक प्रभाव से बच्चों को मुक्त रखता है। बच्चों में छिपी हुई योग्यताओं एवं प्रतिभाओं को निखारता है। गुरु सियाग के योग को बड़ी आसानी से बच्चों की स्कूल और घर की दैनिक क्रियाओं में शामिल किया जा सकता है।
- फोकस होने में :प्राय धारणा है कि मेडिटेशन करने के लिए ध्यान केन्द्रित करना होता है, इसलिए ये बच्चों के लिए नहीं है। ये सोच सही नहीं है| कई बच्चे शांत होकर 15 मिनट नहीं बैठ सकते लेकिन केवल 5 मिनट के लिए ध्यान जरूर कर सकते हैं। जब बच्चे इस शांत समय को एन्जॉय करेंगे तो समय धीरेधीरे अपने आप बढ़ता जायेगा| ये ध्यान बच्चों को उनके कार्यों एवं पढ़ाई में फोकस होने में मददगार है।
- बच्चो में तनाव से मुक्ति : हम प्रायः सोचते हैं कि ध्यान का मतलब विचार शून्य होने की कोशिश करना, जबकि एसा नहीं है। जबकि ये अशांत मन को, शांत करने की विधि है | जैसे पानी भरे गिलास में मिट्टी डालकर हिलाएं, तो पूरे गिलास में मिट्टी तैरती नजर आती है | फिर धीरे धीरे मिट्टी गिलास के पेंदे में बैठ जाती है। कुछ समय बाद गिलास में साफ पानी नज़र आने लगता है जबकि मिट्टी अभी भी गिलास में ही है। बिलकुल उसी प्रकार जब हम मैडिटेशन करते हैं तो विचारों की आंधी कुछ समय तक मन में घूमती है। फिर जैसे जैसे बच्चा मन्त्र जाप पर केन्द्रित होता जाता है वैसे वैसे विचार शांत होने लगते हैं और मन शांत होने लगता है। जब मन शांत होता है तो इसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है और तनाव तुरंत कम या गायब हो जाता है।
- पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन : बच्चे में इस प्रकार घटा हुआ तनाव उसकी सजगता को बढाता है और ध्यान को केन्द्रित करता है। जो विद्यार्थी गुरु सियाग योग का नियमित अभ्यास करते थे उन्होंने बताया कि ध्यान के बाद उन्हें कठिन विषय भी सरल लगने लग गए । एकाग्रता बढ़ने से उनकी याददाश्त भी बढ़ गई और याद भी जल्दी होने लगा ।
- चिंता और डिप्रेशन में कमी : हर थोड़े दिनों में हम सुनते हैं कि कई बच्चे पढ़ाई के बोझ से या फेल होने के डर से या अन्य कारणों से डिप्रेशन में आकर आत्महत्या कर लेते है | यदि 15 मिनट का ध्यान का नियम कर लें तो इस प्रकार की भयानक घटनाओं से बचा जा सकता है। इसलिए कम से कम माँ-बाप या केयर टेकर सुबह शाम ध्यान के लिए बच्चों को बैठा ही सकते है | बच्चे जितनी कम उम्र में ध्यान आरम्भ करेंगे उतनी ही जल्दी तरक्की करेंगे |ध्यान करने वाले बच्चों ने बताया कि वे अब पहले से ज्यादा अच्छी तरह से तनाव व् चिंता से पार पा सकने में सक्षम हैं। परीक्षा से पहले ध्यान, पढ़ने बैठने से पहले ध्यान, मन व शरीर को शांत रखता है और हाथ में लिए गए कार्य में मन अच्छा केन्द्रित होता है। ध्यान भावनात्मक संतुलन को भी मजबूत करता है- बच्चे किसी भी दबाब की परिस्थितियों में भी शांति से घटनाक्रम का अवलोकन करते हैं और बिना इमोशनल या डिप्रेस हुए भविष्य के लिए अच्छे निर्णय ले पाने में सक्षम होने लगते हैं।
- बच्चों में नये आइडिया सोच पाने की क्षमता का विकास : गुरु सियाग की विधी से बच्चे की मानसिक क्षमता का विकास होने से वो नये क्रिएटिव आयडिया सोच पता है। हर कार्य को एक अलग ही ढंग से शीघ्र करने की क्षमता विकसित होने लगती है | जो विकास बच्चों में पेरेंट्स समझा कर नहीं करवा पाते वह इस ध्यान साधना से अपने आप होने लगता है।
- ख़ुशी की मानसिक स्थिति : गुरु सियाग का ध्यान का तरीका, बच्चे के व्यक्तित्व में बहुत अच्छा असर डालता है। वो खुश और आत्मविश्वास से भरे दीखते हैं | कई बच्चों ने बताया कि ध्यान शुरू करने के बाद से वो काफी आशावादी हो गए, उनका हर कार्य में आत्मविश्वास बढ़ गया | मुसीबतों से घबराना बंद हो गया और नई चीजे दिमाग में अपने आप आने लग गई। खुशी की मानसिक स्थिति के कारण बच्चों की झगड़ालू आदतों या मचलने की आदतों में भी कमी आई | वे आसपास के लोगों से ढंग से पेश आने लगे जिससे उनके सामाजिक स्किल एवं सम्बन्धो में भी सुधार आया |
- उच्च चेतना का विकास : बच्चो में दूसरों के प्रति दया एवम सहानुभूति का विकास, दुसरो की जरूरत के प्रति भी सचेतन होना और दूसरों से अच्छे से पेश आना | जरुरतमंदों के प्रति दया का भाव उत्पन्न होना एवं अन्याय के प्रति खड़े होने की क्षमता का विकास होना आदि आदि ।
नोटः पहले तो संयुक्त परिवारों के कारण बच्चे भावनात्मक रूप से सही विकसित होते थे | पर आज के समय में एकल परिवार के कारण बच्चे व् माँ- बाप दोनों चिढ़चिढ़े रहते हैं। बच्चों का मानसिक विकास भी सही प्रकार नहीं हो पाता, परिस्थितियोंवश माँ-बाप भी बच्चों को समय नहीं दे पाते | बच्चों की सही निगरानी नहीं हो पाती। ऐसे में गुरु सियाग की ध्यान की विधि बच्चे को उसके मार्ग से भटकने नहीं देगी | माँ-बाप केवल बच्चे में ध्यान करने के संस्कार भी डाल पाए तो बच्चे का बाकी सब ध्यान कुंडलिनी शक्ति आपने आप रख लेगी और आपके बच्चे को उन ऊंचाइयों पर ले जाएगी जहाँ आप उसे देखना चाहते हैं।
6. गृहस्थ जीवन में रहते हुए भोग और मोक्ष दोनों सम्भव – आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा में तेजी से प्रगति करेंगे, जिसके लक्षण भौतिक जीवन में आपको नजर आने लगेंगे| मानवता के जिस रूपांतरण की बात की जाती है वह घटित होने लगेगा| जो मानव के विकास को उसके उच्चतम स्थिति तक ले जाता है| जीते-जी जिस मोक्ष को पाने की बात करते हैं, उस मार्ग पर तीव्र प्रगति महसूस होने लगेगी|
गुरुदेव का कहना है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भोग और मोक्ष सम्भव है। यहाँ भोग का मतलब है आपने पिछले जन्मों में जाने अनजाने में जो भी अच्छे-बुरे कर्म किये हैं, उन सब कर्मों का भोग इसी जन्म में पूरा हो सकता है| वरना उन कर्मों के भोग के लिए आगे पता नहीं कितने जन्म और लेने पड़ते; अर्थात इस साधना के साथ मोक्ष का रास्ता तो खुलता ही है पर पिछले कर्मों के भोग भी इसी जन्म में बराबर होने लगते हैं| आपको भोग से तात्पर्य भौतिक सम्पन्नता से नहीं लगाना चाहिए| पर आपकी भौतिक तरक्की आपकी साधना के अनुसार अपने आप होती जायेगी| आपको केवल प्रार्थना, ध्यान व नाम-जप करना है |
क्रोध पर नियंत्रण की क्षमता का विकास -सभी प्रकार के क्रोध, परिस्थितियों को कंट्रोल की कोशिश के कारण होते हैं और जब परिस्थितियाँ इच्छानुसार घटित नहीं होती तो हमारे अंदर निराशा और क्रोध उत्पन्न करती हैं| हम अपनी किसी इच्छा को पूरा करने के लिए इतने आतुर हो जाते हैं कि उस इच्छा की पूर्ति न होने पर, हमारी स्वयं की अन्दर की ऊर्जा, अग्नि बन जाती है, ये ही हमें जलाती हैं (क्रोध में लाती है) | मृत्यु के बाद शरीर, अग्नि में जलाया जाता है, अग्नि उसे राख में बदल देती है। लेकिन क्रोध व्यक्ति को जीते जी जलाता है | हम उस गुस्से में, अपना विवेक खो देते हैं तथा क्रोध में वो सब कर देते हैं या कह बैठते हैं जिसे वापस ठीक नहीं किया जा सकता, जिसके कारण कभी कभी हमेशा के लिए नुकसान हो जाता है| इस वजह से उत्पन्न होने वाले गुस्से के कारण जीवन में गलत निर्णयों की श्रृंखला आरम्भ हो जाती है।
थेरापिस्ट और डाक्टर इस गुस्से से डील करने के लिए कई प्रकार के तरीके बताते हैं- जैसे गुस्से को कंट्रोल करने का बाहरी प्रयास (जो कि अंदर से गुस्से भरा), गुस्से को दबाना या उसे किसी अन्य उपयोगी कार्य में डायवर्ट करने की कोशिश, या ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ द्वारा गुस्सा दबाने की कोशिश| कुछ विशेष स्थितियों में गुस्सा से तुरंत राहत के लिए की दवाई देना या दिमाग नियंत्रित करने की दवाई देना आदि| पर ये सारे तरीके कुछ हद तक ही एवं बहुत ही कम समय के लिए सहायता करते हैं। लेकिन गुस्से की समस्या समाप्त नहीं होती| दुसरे शब्दों में कहे तो ये तरीके कुछ हद तक उस गुस्से को बाहर फैलने के बजाय अन्दर की तरफ मोड़ देते हैं पर क्रोध स्थायी रूप से समाप्त नहीं होता|
इस प्रकार क्रोध की कभी समाप्त न होने वाली श्रृंखला बन जाती है। तुम अपना गुस्सा किसी और पर निकल देते हो और वो व्यक्ति भी शांति से उस गुस्से को ग्रहण करने वाला नहीं| उस व्यक्ति का गुस्सा किसी और रूप में आप पर या किसी और पर निकलेगा| इस प्रकार क्रोध शांत होने का कोई अंत नहीं है। ये इसी प्रकार है कि किसी पर कीचड़ उछालोगे तो बदले में कीचड़ ही मिलने वाला है| पीढ़ी दर पीढ़ी यही चलता आ रहा है कि अब ये क्रोध, घृणा में बदल चुका है। कोई इस घृणा – चक्र को तोड़ नहीं पा रहा है| इस गुस्से व घृणा के चक्र को तोड़ा कैसे जाये? इस गुस्से को पूरी तरह से गायब करने या घोलने के लिए ध्यान के समुद्र की जरुरत है।
उदाहरण के लिए – एक मुट्ठी राख कप के पानी को एकदम काला एवं अनुपयोगी बना देगी लेकिन नदी या समुद्र में मिल जाने पर पानी पर कोई असर नहीं दिखेगा। इसी प्रकार आया हुआ, गुस्सा व्यक्ति का शरीर नहीं सम्भाल पाता, उस गुस्से को विलीन होने के लिए ध्यान के समुद्र की जरूरत है। गुस्से का कारण किसी दुसरे में तलाश करने करने के बजाय, साधक को इसे होश पूर्वक ओब्जर्ब करना चाहिए तब व्यक्ति पायेगा कि क्रोध एक प्रकार का आवेग है जिसकी किसी दुसरे व्यक्ति या घटना में नहीं हैं। ध्यान में तुम किसी से गुस्सा नहीं होते। केवल तुम गुस्से में होते हो| तुम पाओगे कि क्रोध एक एसी उर्जा है जो कि बाहरी है एवं तुमने इसे अपने अंदर घुसने के लिए अनुमति दी है| जब ये तुम्हारे अंदर घुसती है तब एक विशेष रूप ले लेती है| ये क्रोध या तो किसी और की तरफ डायवर्ट हो जाता है या स्वयं को खिसियाहट भरी स्थिति में डाल देता है। ध्यान में उस क्रोध की कोई विशेषता नहीं रहती, जैसे ही गुस्सा महसूस हो, साधक को उसे ध्यान में विसर्जित कर देना चाहिए| इस प्रकार जो गुस्सा तुम्हारी तरफ आया था वो उस ब्रह्माण्ड में फेंक दिया जाता है। जैसे एक नदी जब समुद्र में मिल जाती है तो अपना स्वरूप खोकर समुद्र बन जाती है। इसी प्रकार जब गुस्सा ध्यान में रिलीज़ कर दिया जाता है तब वो उस ब्रह्माण्ड में विलीन हो जाता है| ये एक बार के प्रयास से नहीं होने वाला है। साधक को गुस्सा आते ही कोन्सीयसली यानी होशपूर्वक ये विधि अपनानी चाहिए। धीरे- धीरे गुस्सा पूरी तरह से गायब हो जायेगा| यदि गुस्सा आने पर ध्यान कर पाना संभव ना हो तो मन्त्र का सघन जाप करना चाहिए| तुम जैसे ही गुस्से की पहली तरंग महसूस करो, तुरंत मन्त्र जाप शुरू कर दो | मंत्रकी तरंगे उस गुस्से की तरंग की व्यर्थता का अहसास अपने आप करवाएंगी। गुस्से की वो तरंग तुम्हारे अंदर घुसने की बजाय पास से होकर गुजर जाएगी| तुम गुस्से की उस तरंग से अप्रभावित रहोगे|

