(hi) गुरु सियाग योग

Q1. मैं जब भी मुसीबत में होता हूँ तब गुरुदेव के मन्त्र का नाम जप करने से उस मुसीबत से छुटकारा मिल जाता है, पर ये समझ नहीं आता कि मुसीबत बार-बार क्यों आती है?

Ans: आपने कभी सोचा है कि नाम-जप से मुसीबत मिट जाती है, लेकिन मुसीबत आती ही क्यों है? अगर आप नियमित नाम-जप व ध्यान करेंगे तो मुसीबत आएगी ही नहीं। आप इसको इस प्रकार समझ सकते हैं कि, जब आप  नियमित नाम- जप व ध्यान करते हैं तो आपके चारों ओर एक प्रकार का सुरक्षा- घेरा बन जाता है, जो ध्यान व नाम-जप के साथ दिनों-दिन मजबूत होता जाता है एवं अधिकांश समस्याएं उस कवच के कारण परिवर्तित हो जाती हैं और आप पूर्ण सुरक्षित रहते हैं। लेकिन अगर आप नाम-जप या ध्यान रोक देते हैं या अनियमित कर देते हैं तो वह सुरक्षा-घेरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है, एक प्रकार से उसमे छिद्र होने लगते हैं जिसके कारण आपको मुसीबतें प्रभावित करने लगतीं हैं। फिर आप परेशान होकर नाम-जप करने लगते हैं जिसके कारण आप उस मुसीबत से मुक्ति पा जाते हैं। अगर आप नियमित जाप करते रहें तो कवच कमजोर होगा ही नहीं। और जब कवच कमजोर नहीं होगा तो मुसीबतें असर ही नहीं करेंगी। कवच की कार्य-प्रणाली आप इस प्रकार समझ सकते हैं कि कई बार बीमारियाँ फैलती हैं लेकिन उन्हीं बीमारियों के बीच रहकर भी साधकों को बीमारी नहीं होती, और यदि होती भी है तो साधना की गहनता के आधार पर अतिशीघ्र ठीक हो जाती है।

 

Q2. ध्यान के प्रति लगन में कमी, शिष्यों द्वारा प्रायः सुनने में आता है कि जब गुरु सियाग योग आरम्भ किया तब बहुत उत्साह था, बहुत मन से नाम जप व ध्यान होता था। लेकिन कुछ महीनों बाद से लगता है कि ध्यान व मंत्र में पहले वाला उत्साह नहीं रहा है | कई बार नाम जप करने का याद नहीं आता और कई बार ध्यान करना याद नहीं रहता, या आलस लगता है। ऐसा क्यों होता है?

Ans: ऐसा होने के निम्लिखित में से कई कारण हो सकते हैं-

  • किसी भी कार्य से कुछ समय बाद बोरियत होना मानवीय स्वभाव है। अगर कोई बहुत ही मन से और लगन से इस ध्यान व जाप को किसी इच्छा विशेष से आरम्भ करता है या बहुत ही लापरवाह ढंग से आरम्भ करता है तो साधना नियमित नहीं होगी| इसको आप इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि वीणा या सितार के तार बहुत टाइट होंगे या बहुत ढीले होंगे तो दोनों ही परिस्थितियों में वीणा नहीं बजेगी।
  • पहले केस में, यदि साधना बहुत ही आर्मी स्टायल, में बहुत सीरियस होकर, करेंगे तो मन में एक प्रकार का तनाव होने लगता है। इस प्रकार के साधक अपने आपको सामाजिक रूप से अकेला पाते हैं, और बहुत सीरियस होकर एकदम किसी निश्चित समय पर ध्यान करते हैं, ध्यान करने के लिए सुबह बहुत जल्दी उठेंगे, ध्यान के हर अनुभव की काफी चर्चा करेंगे, कोई ध्यान के समय आवाज़ या शोर हो जाये तो उन्हें क्रोध आएगा, या जाप करने के लिए अपने को अकेला कर लेंगे। हालाँकि उनके प्रयासों को गलत नहीं कहा जायेगा, पर इस प्रकार की साधना को आर्मी स्टाइल में लम्बे समय तक किया जाना संभव नहीं है। इस प्रकार के साधक अध्यात्मिक थकान अनुभव करने लगते हैं | और उन्हें इस कार्य से कुछ समय आराम की आवश्यकता होगी|
  • दूसरी ओर कई साधक इस साधना के प्रति काफी लापरवाह होते हैं, उनका ध्यान का कोई समय निश्चित ही नहीं होता, कई बार वे नियमित ध्यान को मिस कर जाते हैं और उस ध्यान को वीक एंड्स में या छुट्टी के दिन उस मिस हुए ध्यान के बदले में करते हैं। कई बार वे ध्यान करना भूल ही जाते हैं। कई बार दोस्तों या रिशेदारों के यहाँ होने पर बाकी सब कुछ करते हैं पर ध्यान नहीं करते और उस समय मन्त्र जाप तो याद ही नहीं आता| स्पष्ट है कि इस प्रकार के साधक अपने व्यक्तित्व में बदलाव भी महसूस नहीं करते, इस कारण साधना से भी उनका लगाव कम होता जाता है।

उपरोक्त दोनों प्रकार की अति साथना के लिए अच्छी नहीं है। साधक को मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए, यानि साधना नियमित हो परन्तु आर्मी स्टाइल में नहीं। मानसिक रूप से अपने आप को सुबह व् शाम ध्यान करने के लिए याद रखें। ध्यान का समय आगे पीछे होने की चिंता न करें| लेकिन अन्य कार्यों की भांति ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बना लें। फिर भी याद ना रहे तो कुछ समय के लिए फोन में अलार्म लगा लें। कुछ ऐसे चिन्ह निर्धारित कर लें कि उन्हें देखते ही जाप करने का याद आये।

साधना की शिथिलता से बचने का एक अन्य उपाय ये है कि आप ऐसे व्यक्तियों के सम्पर्क में रहें जो गुरु सियाग की साधना से सम्बन्धित हों और उनके विचार से आप भी सहमत हों। तो इस प्रकार के व्यक्तियों के साथ आध्यात्मिक अनुभवों के आदान प्रदान से काफी मानसिक मदद मिलती है। कई बार (जैसे विदेश में) साधकों के पास उनके आध्यात्मिक अनुभवों को समझने के लिए या चर्चा करने के लिए, या साधना में आने वाली बाधाओं के विषय में जानने के लिए कोई आस पास नहीं होता तो वे अकेलापन एवं निराश अनुभव करते हैं। कई बार साधक, साधना इसलिए छोड़ देते हैं कि उनके पास कोई इस बारे में बात करने वाला नहीं होता| समाज में कम्युनिटी फीलिंग बहुत होती है इस कारण अपने देखा होगा कि लोग सामूहिक धार्मिक आयोजन करते हैं ताकि अकेलेपन से बाहर आ सकें ।

  • कुछ साधक अपनी पूर्व की आध्यात्मिक प्यास के कारण बहुत तरीकों की बुक्स, पोस्ट्स, या योग के अन्य मार्गों के बारे में पढ़ते हैं। इससे आध्यात्मिकता के बारे में उनकी अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हो जाती हैं। जब वो साधक गुरु सियाग योग आरम्भ करते हैं तो उनका मन उस पूर्व जानकारी के आधार पर एकदम सब कुछ पाने के लिए प्रयास करने लगता है। वे अपनी अपेक्षाएं इस ध्यान के माध्यम से तुरत पूरी होते देखना या अनुभव करना चाहते हैं। उस समय वे भूल जाते हैं कि ध्यान में होने वाले अनुभव व् अनुभूतियाँ पिछले जन्मों में की गयी साधना से भी लिंक हैं | इसीलिए अनुभव एवं अनुभूतियां कोई एक निश्चित पैटर्न के आधार पर नहीं होती, वे सभी के लिए अलग अलग होती हैं। लेकिन जब साधक को उसकी उम्मीदों के अनुसार परिणाम प्राप्त नहीं होते तो साधक साधना से विमुख होने लगता है। इसका मतलब ये भी नहीं है कि अन्य योग की अन्य किताबें ना पढ़ी जाएँ। लेकिन पढ़ते समय ये जरुर ध्यान रखा जाये कि वो सभी बातें गुरु सियाग योग के लिए लागू हो ये बिलकुल भी जरुरी नहीं है। हर योग विधि का अपना तरीका है, अतः उनके अनुभव भी उसी आधार पर अलग प्रकार से होंगे । लेकिन गुरु सियाग की योग विधि के फायदे पूरी तरीके से अनुभव करने के लिए पूर्व ज्ञान को कुछ समय के लिए अलग हटा दें तो ज्यादा जल्दी परिणाम आयेंगे।
  • कुछ साधक कहते हैं कि गुरु सियाग योग आरम्भ करते ही अच्छे अनुभव हुए| प्रत्येक ध्यान के अलग अलग अनुभव होते हैं। विभिन्न प्रकार की योगिक क्रियाएँ, अनुभूतियाँ, अनुभव आदि आदि | लेकिन ये निरंतर नहीं चलता और कुछ समय बाद धीरे धीरे कम हो जाता है या एक ही प्रकार का अनुभव या योगिक क्रिया निरंतर होती रहती है। अन्य अनुभव भी जब कभी या बहुत कम हो जाते हैं। साधक को निराशा होने लगती है कि ये सब अनुभव बंद या कम क्यों हो रहे हैं। फिर साधक को साधना बोरियत भरी लगने लगती है। इस सब के बारे में जब एक साधक ने गुरुदेव से पूछा तो गुरुदेव ने बताया कि “साधक की आध्यात्मिक प्रगति उसके शरीर छोड़ने के साथ रूकती नहीं है, ये तो केवल भौतिक शरीर है जो विलीन हो जाता है, अगले जन्म में जब भी साधक योग करता है तो उसकी यात्रा वहीं से शुरू होती है जहाँ उसने पिछले जन्म में छोड़ी थी। जब ये कनेक्शन इस जन्म में जुड़ता है तो चेतना के स्तर अचानक ही खुलने लगते हैं और अनुभूतियों और अनुभवों का अचानक फ्लो या बहाव आता है और शक्ति अपना अहसास करवाती है| एक बार जब ये सम्पर्क नियमित साधना से मजबूती से स्थापित हो जाता है तो साधक चेतना के उच्च स्तरों की ओर अग्रसर होता है, तब उसे फिर अनुभूतियों के उस आवेग की जरूरत नहीं रहती। लेकिन साधक इसे साधना कमजोर मानकर निराश होने लगता है| जबकि वास्तव में तो साधक चेतना के अगले स्तर पर पहुँच जाता है। सच तो यह है कि साधक को इन अनुभूतियों का लालच किये बिना निरंतर अभ्यास जारी रखना चाहिए।” गुरु सियाग का दर्शन बताता है कि अनुभूतियाँ होना तो केवल आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ होने का संकेत मात्र है। निरंतर प्रगति के लिए साधक को अंतःकरण से गुरुदेव से प्रार्थना एवं नियमित साधना करनी चाहिए। दुसरे शब्दों में जिस प्रकार हम पढ़ाई में, व्यापार में, नौकरी आदि में मेहनत करते हैं उसी प्रकार का समर्पण और लगन आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक है। गुरुदेव का कहना है कि मुक्ति कोई बच्चों का खिलौना नहीं है जो गुरु ऐसे ही दे देगा। इसे पाने के लिए साधक को समर्पण, फोकस, कड़ी मेहनत और लगन की आवश्यकता होती है।
  • कुछ साधक ऐसे होते हैं जिनको कोई भी अनुभूति या अनुभव नहीं होता। वो साथना इसलिए नहीं करते क्यों कि वो देखते हैं कि उनके आसपास के लोगों को योगिक क्रियाएँ, मुद्राएँ, बीमारी ठीक होना या दुसरे फायदे होने जैसा हो रहा है और उन्हें स्वयं कुछ भी नहीं हो रहा।

 

Q3. कई बार बोला हुआ सत्य हो जाता है, दूसरों के विचार समझ में आने लगते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब रुकता हुआ लगता है?

Ans: ऐसा अलग-अलग चक्रों के चेतन होने से, एवं उनसे जुड़ी हुई शक्तियों के चेतन होने के कारण होता है| आपको इनमें उलझना नहीं है| हर चक्र के चेतन होने के साथ, एवं आगे बढ़ने के साथ सिद्धियों का आना-जाना चलता रहेगा| आप बिना कोई चिंता किये केवल नाम-जप व ध्यान करते रहें। अगर आप उन सिद्धियों को दूसरों से तारीफ पाने के लिए प्रचारित करेंगे तो ये आपके आगे के विकास को अवरुद्ध करेगा|

इसे आप इस प्रकार समझें कि आप एक दौड़ में हिस्सा ले रहे हैं जिसमें आपको रास्ते में चांदी का टुकड़ा पड़ा दिखता है तो आप उस पर से पैर रखकर निकल जाएँ, अगर उस टुकड़े के लालच में उलझ गए तो आगे की यात्रा रुक जायेगी| आगे सोने का टुकड़ा पड़ा मिलेगा, उस पर से भी पैर रखकर दोड़ते जायें| आगे हीरा पड़ा होगा उसका भी लालच ना करें, उसको भी पार कर जाएँ, आगे हीरों की खान मिलेगी| इसी प्रकार गुरुदेव के ध्यान के इस मार्ग में आपको चांदी, सोने, हीरे के रूप में, हर चक्र से सम्बन्धित सिद्धियाँ मिलेंगी| आगे आपको इतना मिलेगा कि आपने सोचा भी नहीं होगा। आपको उनमें उलझना नही है, अगर आप उनका दुरूपयोग करना या अपनी शान दिखाना आरम्भ कर देंगे तो आपकी आगे की आध्यात्मिक यात्रा, आपके लालच के कारण रुकने लगेगी|

 

Q4. सब कुछ अच्छा चलते हुए भी मन अचानक विचलितहोने लगता है या उदासी घेर लेती है? ऐसा क्यों होता है?

Ans: जब ध्यान व नामजप से साधना आगे बढ़ती है तो चेतना का स्तर बढ़ने लगता है| आत्मा का स्वरूप पहचान में आने लगता है। अपने इस जन्म का लक्ष्य समझ आने लगता है। दुनिया की भौतिकता से मन ऊबने लगता है इसलिए कई बार कुछ भी अच्छा नहीं लगता| फिर आस-पास का वातावरण उसी भौतिकता में ले जाना चाहता है। जो मित्र या पारिवारिक सदस्य ध्यान व नामजप नहीं कर रहे होते हैं, वे वापस भौतिकता में खींचने का प्रयास करते हैं। क्या करें क्या न करें, का मानसिक द्वंद चलने लगता है। ऐसे समय में विचलित नहीं होना चाहिए एवं ध्यान व नाम जप तीव्र कर देना चाहिए। किसी से भी मित्र से गुरु चर्चा आरम्भ कर देनी चाहिए या किसी नए व्यक्ति को गुरुदेव का दर्शन बताना चाहिए| कुछ समय बाद अपने आप सब सामान्य हो जायेगा।

ऐसा साधना के आरम्भ में कई बार होता है फिर ऐसा विचलन होने की आवृत्ति धीरे-धीरे घटती जाती है | ऐसी स्थिति लगभग हर साधक के साथ कभी न कभी आती है, पर बिलकुल भी चिंता न करें। ऐसी स्थिति से बाहर निकलने के बाद हर बार आप नए चेतना स्तर की और आगे बढ़ेंगे।

आप एक बात और ध्यान रखें कि अगर आप किसी चिंता के कारण परेशान होते हैं तो उस समय आप मन से नाम-जप करें, क्योंकि किसी भी परेशानी या चिंता के बारे में सोचने से वह परेशानी कम नहीं होगी, लेकिन नियमित नाम-जप करने से या तो परेशानी आएगी ही नहीं या आने वाली परेशानी कम हो जायेगी।

 

Q5. हमने देखा है कि कई लोगों को इस साधना से बीमारी या परेशानी में बहुत जल्दी फायदा होता है, हमें ऐसा फायदा क्यों नहीं होता? हम पूजा-पाठ व अन्य कर्म-कांड करने के साथ-साथ गुरुदेव की साधना भी पूरे मन से कर रहे हैं?

Ans: आप मनन करेंगे तो पायेंगे कि जितना प्रतिशत या भाग आप दूसरी पद्धतियों या पूजा-पाठ में उलझे हुए हैं उतने ही भाग के बराबर आपकी श्रद्धा बंटी होने के कारण फायदा धीरे या कम होगा| अगर आप दो में बँट जायेगे तो फ़ायदा भी आधी गति से होगा| आप स्वयं मनन करें कि आप क्या कर रहे हैं? पुराने साधकों के अनुभवों के आधार पर आप स्वयं निष्कर्ष निकालें कि आपको वांछित परिणाम धीरे, कम क्यों मिल रहे हैं?

एक ही प्रकार की बीमारी के 3 साधकों ने अपने अनुभव बताए| पहले ने कहा कि मैं 2 साल से गुरुदेव का नियमित ध्यान करता हूँ फिर घर के मंदिर में पूजा करता हूँ। मेरी बीमारी 2 साल में, 20 प्रतिशत ठीक हुई है |

दूसरे साधक नें बताया कि मैं एक साल से गुरुदेव का नियमित ध्यान करता हूँ, और कोई खास पूजा तो नहीं करता पर सबको अगरबत्ती लगा लेता हूँ, मेरी बीमारी एक साल में 50 प्रतिशत ठीक हुई है|

तीसरे साधक ने बताया कि मैं 3 महीने से गुरुदेव का नियमित ध्यान कर रहा हूँ एवं मेरी बीमारी में 3 महीने में 90 प्रतिशत आराम आ गया है| उसने पूजा-पाठ के बारे में पूछने पर बताया कि – अगर उन चीजों (पुरानी पद्धतियों) से अगर फायदा हो रहा होता तो गुरुदेव द्वार बतायी साधना करने की जरूरत ही क्या थी? फिर तो उन्हीं सब कर्म-कांड में उलझे रहना ज्यादा अच्छा था| अब तो मैं सब कुछ छोड़कर सारे भगवान व पूजा-पाठ इसी साधना में देखता हूँ| सब कुछ अच्छे-बुरे की चिंता छोड़ दी है|

अब आप स्वयं निर्णय करें कि उपरोक्त तीनों साधकों को अलग- अलग परिणाम क्यों मिल रहे हैं? जिसकी जितनी श्रद्धा बँटी हुई है उसी अनुसार परिणाम आ रहे हैं | आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा| साधना के प्रति जितना समर्पण उतना ही परिणाम| आप ये भी ध्यान रखें कि जब कोई कार्य नहीं करना हो तो उसके लिए एक नहीं दस बहाने बनाये जा सकते हैं और कार्य करना हो तो केवल इच्छा ही बहुत है| इसी प्रकार किसी भी पुराने कर्म-कांड या आडम्बर को निरंतर जारी रखने के लिए एक नहीं, बीस बहाने बनाए जा सकते हैं, और इन्हें छोड़ना हो तो केवल ध्यान एवं नाम-जप की एकमात्र इच्छा ही बहुत है।

 

Q6. कुछ साधक कहते हैं कि कई साल बाद भी गुरु सियाग योग निरंतर करने के बाद भी मनवांछित परिणाम नहीं मिल रहे हैं, क्या कारण हो सकते हैं?

Ans: इस प्रश्न के उत्तर साधक अपने आप दे देते हैं आप स्वयं ही देखिये साधकों के जवाब –

Q7. मनचाहा परिणाम ना पाने वाले कुछ साधकों के जवाब ?

Ans:

  • सुबह ध्यान का समय नहीं मिलाता, पर शाम को बिल्कुल करते हैं,
  • शाम को ध्यान का समय नहीं मिलता, लेट हो जाते हैं,
  • कई बार सुबह का या शाम का ध्यान मिस हो जाता है,
  • ध्यान तो करते हैं पर नाम जप नहीं हो पाता,
  • नाम जाप करते हैं पर ध्यान नहीं कर पाता,
  • घर से बाहर या शादी फंक्शन में जाते हैं होते हैं तो ध्यान नहीं कर पाते,
  • किसी के प्रति गुस्सा, ईर्ष्या, या नाराज़गी का भाव आता है तो नाम जाप याद नहीं आता,
  • जब बीमार, दुखी, नर्वस या चिंता में होते हैं तो नाम जाप याद नहीं,
  • सुबह शाम ध्यान के अलावा कई बार पूरा पूरा दिन निकल जाता है मंत्र जाप याद ही नहीं आता,
  • घर पर मेहमान या पार्टी होने पर या पारिवारिक तनाव होने पर ध्यान नहीं हो पाता,
  • दिमाग राजनीति करता है पर उस समय जाप याद नहीं आता,

यानि ध्यान व् नाम जप नहीं कर पाने के हज़ार कारण हो सकते हैं, फिर साधना को जिम्मेदार क्यूँ ठहराया जाये कि लम्बे समय से ध्यान कर रहे हैं फिर भी फायदा नहीं हो रहा। अगर आप इस साधना से ज्यादा अन्य बातों को ज्यादा महत्व देंगे तो साधना परिणाम कैसे देगी? जब आपके पास भगवान के लिए मन से समय नहीं है या आप ध्यान को प्राथमिकता से नहीं ले रहे हैं तो ईश्वरीय शक्ति के पास भी आपकी इच्छाओं को पूरा करने लिये समय नहीं है। या ईश्वरीय शक्ति भी कृपा समयानुसार होगी |

Q8. मनचाहे परिणाम पाने वाले कुछ साधकों के जबाब ?

Ans:

  • सुबह उठते ही सबसे पहला काम ध्यान करना है, बाद में कोई भी काम|
  • किसी दिन खाना पीना, चाय पानी, नहाना – ब्रश करना भूल सकते हैं, पर एसा एक भी दिन नहीं गया जब दो बार ध्यान न किया हो और मुसीबत, चिंता या तनाव में नाम जाप न किया हो,
  • सुबह या शाम के समय हवाई जहाज़ में, रेल में, बस में, कार में, टैक्सी में कहीं भी यात्रा कर रहे हों पर लेटे हुए या बैठे हुए दो बार का ध्यान अवश्य किया,
  • चाय, पानी, खाना, नाश्ता, से पहले 2 सेकेण्ड के लिए ही सही, पर पढने बैठने से पहले, ऑफिस जाने से पहले, काम के लिए गुरुदेव को याद अवश्य करते हैं, निकलने से पहले, घर का काम शुरू करने से पहले, या कोई भी कार्य शुरू करने से पहले गुरुदेव का नाम लेकर शुरू करते हैं।
  • घर में, या ऑफिस में या जहाँ भी होते हैं, व्यवहार इस प्रकार का होता है कि यदि गुरुदेव साथ बैठे होते तो व्यवहार कैसा होता | उसी अनुसार आचरण करने का प्रयास रहता है।
  • घर में शादी हुई हो या कोई दुर्घटना पर दो बार का ध्यान कभी मिस नहीं किया। मन में भाव रहता है कि दुनियां इधर की उधर हो जाये पर दो बार का ध्यान तो करना ही है, कुछ भी क्यों न हो जाये|
  • कभी घर में मेहमानों की वजह से स्थान नहीं मिला तो घर के बाथरूम में या छत पर जाकर ध्यान किया | पर ध्यान मिस नहीं किया,
  • पति, पत्नी, मित्र, बच्चे, नौकरी, व्यवसाय, बीमारी, घर के किसी सदस्य से पारिवारिक तनाव होने पर, आदि किसी के भी बारे में चिंता आते ही “चिंता” को, मंत्र याद रखने के लिए एक अलार्म के रूप में लेते हैं यानि चिंता आते ही तुरंत मंत्र जाप याद आता है। जाप ज्यादा बार होता है।

यानि इस स्थिति में कुछ भी हुआ, ध्यान व् नाम जप मिस नहीं किया गया। यानि ध्यान न कर पाने के हजार बहाने हैं और ध्यान करना है तो इच्छा ही बहुत है। तो आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि साधना के परिणाम किस प्रकार आपकी श्रद्धा व समर्पण पर निर्भर करते हैं।

यहाँ पर एक बात स्पष्ट है कि भरोसा करने का मतलब है कि चिंताएं ध्यान व मंत्रजाप पर छोड़ देना और किसी भी बात की चिंता आते ही अंदर से कहना कि आज तक स्वयं का दिमाग लगाकर चिंताओं से मुक्ति पाने का बहुत प्रयास किया पर पर अब ये लगाम आपको सौंपता हूँ, फिर आप देखिये कि आपके बनाये गए प्लान की तुलना में, ईश्वरीय प्लान कितना जल्दी और नए तरीके से कार्य करते हैं। अगर आपके मन में चिंता है तो समझ जाइये कि सघन मंत्र जाप करने का समय आ गया और परिस्थितियों का नियन्त्रण ऊपर वाले के हाथों में देना है यानि मन्त्र जाप करना है|

Q9. ध्यान क्या करता है?

Ans: हम सब अपनी उलझनों या परेशानियों के बारे में कुछ ना कुछ बोलते या सोचते रहते हैं| कभी सोचा है कि – भगवान भी आपकी उलझनों को सुलझाने के लिए आपसे बात करना चाहते होंगे? पर हमारे पास भगवान की बात सुनने का या ध्यान करने का समय ही नहीं है| ध्यान में क्या होता है? – भगवान आपसे बात करता है कैसे? – ध्यान के समय 15 मिनट के लिए आपके अंदर मौजूद भगवान की ऊर्जा का प्रवाह होता है| उस ऊर्जा के कारण आप दिन भर के कामों के सही निर्णय ले पाते हैं| आपका मन इस ब्रह्मांड में से उन्हीं विचारों या निर्णयों को कैच करता है जो आपकी भलाई के लिए जरूरी हैं| दिन भर में लिए गए अच्छे निर्णयों के पीछे सुबह के ध्यान के कारण मिली ऊर्जा व शक्ति है|

फिर कुछ समय बाद आप कहेंगे कि – मेरे मन ने क्या अच्छा निर्णय लिया कि मैंने धोखा नहीं खाया, क्यूँ कि उस निर्णय के पीछे परमात्मा की शक्ति (ध्यान के द्वारा मिली) कार्य करती है| इसी प्रकार शाम का ध्यान पूरे दिन के थके शरीर व दिमाग़ को रिसेट कर देता है|

 

Q10. ध्यान सुबह उठते ही करना या जरूरी कार्य निपटा कर करने में परिणामों में अंतर क्यों आता है?

Ans: इस बात को एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं –

पहली स्थिति में – हम सुबह उठकर आराम से परिवार के साथ आनंद के साथ चाय पीते हैं| और फिर अपने दैनिक कार्य शुरू करते हैं| फिर अन्य कार्य या ऑफिस के लिए तैयार होते हैं|

दूसरी स्थिति में – हम पूरे तैयार होकर भागते भागते या जल्दी जल्दी चाय पीते हैं|

अब आप बताइए कि किस स्थिति को चाय पीने का आनंद मानेंगे? निश्चित रूप से प्रथम स्थिति|

अब इस घटना को ध्यान से जोड़कर देखिए –

पहली स्थिति में – आप सुबह उठे, मोबाइल देखा, मेसेज पढ़े, उत्तर दिए, ऑफिस या व्यापार कार्य (जैसे माल के बारे में, लोडिंग – अनलोडिंग, पेमेंट लेन – देन आदि) के लिए जरूरी फ़ोन किया, कुछ जरूरी किए जाने वाले कामों के बारे में स्टाफ से बात की, घर वालों को भी निर्देश दिए आदि आदि| फिर ऑफिस या कार्य स्थल पर जाने के लिए तैयार होने का विचार करते हुए ध्यान भी करने का सोचा| ध्यान में विचार आयेंगे जैसे – मोबाइल में दिए गए मैसेज के, कुछ ऑफिस वालो को दिए गए निर्देशों के, कुछ विचार ऑफिस जाते ही क्या करना है? किसको क्या कहना है? एक विचारों की शृंखला आरंभ हो जाएगी। इन विचारो के साथ आपका ध्यान होगा| आपको भी लगेगा कि ध्यान की औपचारिकता ही हुई है| फिर ऑफिस पहुँच कर भी लगा कि कामो को जैसे सुबह सोचा था वैसे नहीं हो रहे। पूरा दिन भी अस्त व्यस्त, चिंता में रहा|

दूसरी स्थिति में – आपने सबसे पहले उठते ही ध्यान किया और फिर कोई भी दूसरा काम| ध्यान के बाद अब आप ऊपर वर्णित स्थिति वाले कार्य करो, आप पाओगे कि ऑफिस पहुँच कर वो सब आराम से हो रहा है जो आपके हित  में है| ध्यान के बाद जितने भी कार्य या निर्णय किए उनको एक प्रकार की पॉजिटिव ऊर्जा का बैकअप मिल गया| निर्णय ग़लत नहीं होंगे| पूरा दिन शांत बिना उलझन का निकला| अब आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि – उठते ही सबसे पहले ध्यान कर लेना चाहिए|

 

Q11. मैं कई वर्षों से गुरु सियाग का नियमित ध्यान व नाम जप कर रहा हूँ, फिर भी वांछित परिणाम नजर नहीं आ रहे | परेशानियां कम नहीं हो रही? समझ नहीं आ रहा कि गलती कहाँ हो रही है? जबकि मैं गुरुदेव की साधना के अलावा कुछ भी नहीं मानता हूँ ?

Ans: जैसे दूध में शक्कर डालते जायें फिर भी दूध मीठा न हो, तो ये कैसे सम्भव है? या इसका मतलब है शक्कर (जिसे हम शक्कर समझ रहे हैं), शक्कर ही नहीं है। इसी प्रकार क्या हम ये सोचते हैं या कहना चाहते हैं कि ये ध्यान व नामजप सही नहीं है या हम मन से करते हैं पर रिजल्ट नहीं आता| सच्चाई तो ये है कि आपके भौतिक जीवन में होने वाले फायदे इतने सहज रूप से होते हैं कि आपको अंदाजा ही नहीं होता कि ध्यान व मंत्र की शक्ति कितनी सहज रूप से कार्य कर रही है। पौधे या बच्चे कब धीरे- धीरे बड़े होते जाते हैं पता नहीं लगता पर, हर पल बड़े होते जाते हैं। इसी प्रकार हर ध्यान व नाम जप से आप में आने वाला परिवर्तन आपको महसूस नहीं होता|

जब साधक कहते हैं कि हम ध्यान व नाम-जप के अलावा कुछ नहीं करते, फिर भी कोई फायदा नहीं हो रहा, तो हमें स्वयं मनन करके अपने अंदर बंधी वह जंजीर ढूंढनी है कि हम अंदर से किसी पुरानी परिपाटी या आडम्बर या कर्मकांड से चिपके हुए हों एवं आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं| बाहर से आडम्बरों या कर्मकांडों से मुक्ति पाने का दिखावा एवं अंदर से आडम्बरों या कर्मकांडों से मुक्ति पा जाने में काफी अंतर है|

इसके आलावा वह जंजीर कई रूपों में बहुत सूक्ष्म रूप से आपको बांध कर रखे हो सकती है| जैसे आप योग की दूसरी विधि भी अपना रहे हों, आप किसी तांत्रिक, फकीर, या पंडित के पास उपचार के लिए जाते हों, दूसरे मन्त्र भी कर रहे हों, कोई धागा, ताबीज, लच्छा, स्टोन पहन रखा हो|

इसे आप एक उदाहरण से भी समझ सकते हैं – दो व्यक्तियों ने एक शाम नाव से किसी दूसरे स्थान पर जाने का प्लान बनाया| जाने के सामान की तैयारी के साथ उन्होंने खूंटे से बंधी नाव की रस्सियाँ खोलकर चप्पू चलाना आरम्भ किया और रात-भर चलते रहे| सुबह होने पर रोशनी में देखा कि नाव तो वहीं की वहीं है। जबकि रस्सियाँ सभी खोल दी थीं| कारण ढूंढा तो पता लगा कि नाव के पेंदे में बंधी एक रस्सी खोलना भूल गए थे और रात-भर मेहनत करने के बाद भी परिणाम नहीं मिला| तो ये आपको ढूंढना है कि साधना के प्रति समर्पण में कमी कहाँ है? आप स्वयं जाँच करें कि आप क्या कर रहे हैं| वांछित परिणाम अवश्य मिलेंगे |

 

Q12. खुद का ध्यान अच्छा पर दुसरे नहीं सुनते, क्या करें?

Ans: गुरुदेव के कई नए शिष्यों को एक समस्या आती है कि उनका खुद का ध्यान अच्छा लग रहा है पर जब वे किसी नए व्यक्ति को इस दर्शन के बारे में बताते हैं तो कोई उनकी बात को गंभीर रूप से नहीं लेता| इस कारण वे हताश हो जाते हैं। कुछ के परिवार में तो घर के सदस्य ही उनकी बात नहीं मानते जैसे किसी के माता-पिता, या उनके पति, या उनकी पत्नी, या उनके बच्चे आदि| नए शिष्यों को लगता है कि जब घर वाले ही मानते तो बाहर वाले क्यों मानेगे? नए लोग, दर्शन बताने वाले साधक को ही उल्टे-सीधे प्रश्न पूछ कर कन्फ्यूज़ कर देते हैं| नये साधकों के पास एसा कोई अनुभव नहीं होता जिसका वे ठोस रूप में प्रत्यक्ष उदाहरण दे सकें|

तो इस बारे में एक उदाहरण लिया जाये कि PMT की परीक्षा पास करते ही कोई डॉ नहीं बन जाता| उसके लिए कई वर्ष मेहनत करनी पड़ती है| मेडिकल का प्रथम वर्ष का विद्यार्थी मेडिकल की टर्म्स समझने लगता है परन्तु हॉस्पिटल में बैठकर इलाज नहीं कर सकता या मरीजों के ऑपरेशन नहीं कर सकता| उसी प्रकार ड्राइविंग सीखते ही हाईवे पर ड्राइविंग में भी रिस्क बहुत है, ड्राइविंग की जा सकती है पर एक्सीडेंट के चांस भी उतने ही ज्यादा होंगे| उसी प्रकार कुछ नए साधकों को भी आरम्भ में किसी नए इन्सान को समझाना मुश्किल लग सकता है।

वैसे तो कोई भी साधक किसी भी समय से, किसी भी प्रकार से गुरुदेव के दर्शन का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है पर प्रचार करने में परेशानी आने की स्थिति में नए साधक को प्रचार कार्य शुरू करने से पहले कुछ समय तक सघन साधना करनी चाहिए। साधना से उसमे स्वयं में जो बदलाव आयेंगे उससे न केवल नए व्यक्ति, बल्कि पारिवारिक सदस्य भी होने वाले पोजिटिव बदलावों से प्रभावित होकर साधना आरम्भ कर देंगे| गुरुदेव का कथन है कि साधना से होने वाले परिवर्तन स्वयं को तो क्या दुनियां को भी पता लगेंगे| लेकिन ये बदलाव कितने समय में दूसरों को महसूस होते हैं ये पूरी तरह से आपकी साधना व् समर्पण पर निर्भर हैं| जब तक आप अन्दर से पूरे तैयार नहीं हैं तब तक नये व्यक्ति को इतना कहा जा सकता है कि मैंने ये साधना (मंत्र व् ध्यान) अभी नया आरम्भ किया है एवं कुछ अच्छा महसूस किया है, कई लोगों को अत्यधिक फायदे हुए हैं, मैं भी प्रयासरत हूँ, आप भी कोशिश करके देख लीजिये|

 

Q13. परिवार के कुछ सदस्य इस ध्यान पद्धति के विरुद्ध हैं| क्या करें?

Ans: आप उनको एक बार समझाने के बाद बार-बार समझाने का प्रयास न करें| वो जिस मार्ग पर चल रहे हैं चलने दें| आप स्वयं पूरे मन से ध्यान व नाम जप करते रहें। कुछ समय बाद आपके अंदर होने वाले परिवर्तनों एवं फायदों को देखकर वे स्वयं ध्यान करना आरम्भ कर देंगे|

ध्यान से तो परिवार में शांति आनी चाहिए| पूरे परिवार के ध्यान करने के बाद भी पारिवारिक क्लेश बढ़ते हुए प्रतीत होते हैं। क्यों?

अगर पूरा परिवार ध्यान कर रहा है तो आप क्लेश होने पर भी चिंता ना करें| ऐसा कई बार चेतना के स्तर में अंतर होने के कारण होता है| वर्तमान में भले ही हम एक ही परिवार के सदस्य हों पर पूर्व-जन्मों की यात्रा सबकी अलग-अलग है। इसलिए इस जन्म में साधना के बाद चेतना के अलग स्तरों को लगभग एक जैसे स्तर पर आने में समय लगता है| इस कारण वैचारिक भिन्नता स्वाभाविक है एवं एक दूसरे को गलत ठहराने की या जबरदस्ती समझाने की कोशिश ना करें| आप केवल धैर्य-पूर्वक ध्यान एवं नाम-जप करते रहें| परिस्थितियों को स्वयं कंट्रोल करने की कोशिश न करें, बल्कि गुरुदेव पर छोड़ दें।

गुरु से दीक्षा लेकर आपका दूसरा जन्म होता है| जब तक गुरु से मार्ग नहीं मिला था तब तक अज्ञानतावश या संस्कारवश स्थितियों को स्वयं कण्ट्रोल करने की कोशिश करना समझा जा सकता है, पर गुरु से दीक्षा लेने के बाद से केवल ध्यान, नामजप व प्रार्थना पर भरोसा रखना चाहिए| जब जन्म एवं मृत्यु आपके नियंत्रण में नहीं हैं तो बीच के जीवन काल की परिस्थितियों का नियंत्रण भी गुरुदेव पर छोड़ देना चाहिए| जब आप परिस्थितियों को दिमाग लगाकर नियंत्रित करने की कोशिश बंद कर देंगे, और उस परेशानी के मौके पर नाम जाप को ज़्यादा महत्व देंगे, तब महसूस करेंगे कि शक्ति हर पल आपकी मदद कर रही है|

जब से ध्यान आरम्भ किया है ऐसा लगता है कि परेशानियां बढ़ने लगी हैं। कई बार ऐसा भी लगता है कि अचानक बिना बात ही नुकसान हो रहा है।

 

Q14. परेशानियां बढ़ने का तो सवाल ही नहीं है, आपको केवल ऐसा लगता है| इसका पहला कारण हो सकता है कि आप पूरे मन से ध्यान या सघन नाम-जप न कर पा रहे हों| इसलिए परेशानियां बढ़ नहीं रही लेकिन घटती हुई प्रतीत नहीं होतीं?

Ans: दूसरा कारण – जो भी होगा इसी जन्म में होगा, इसी जन्म में जीते-जी मोक्ष हो जायेगा; यानि पिछले सब जन्मों के पाप-पुण्य का हिसाब इसी जन्म में हो जायेगा| आपके द्वारा पिछले जन्मों में जाने अनजाने में किये गए गलत कर्मों की सजा भी आंशिक रूप में (जैसे – पिछले जन्मों की 100 गलतियों की सजा, इस जन्म में 5 गलतीयों की सजा के बराबर) इसी जन्म में मिल जाती है| गलत किया है तो सजा तो भुगतनी पड़ेगी, पर ध्यान व मंत्र जाप से पिछले जन्म की बड़ी गलती की सजा इस जन्म में छोटे रूप में मिलकर आपको मुक्ति की ओर ले जाती है| जैसे- माना कि पिछले जन्म में कोई ऐसी गलती की है जिसकी सजा के रूप में, इस जन्म में हाथ टूटना लिखा था, तो पता पड़ेगा कि अचानक ही कोहनी में किसी चीज के टकराने से चोट लग गयी| आप सोचोगे अचानक ऐसा क्यों हुआ, मैं तो नियमित ध्यान व नामजप करता हूँ और कुछ गलत भी नहीं करता, फिर चोट क्यों लगी? पर किसी बड़ी गलती की सजा छोटी सी! पर भुगतनी तो पड़ेगी|

इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि इस जन्म में यथासम्भव अच्छा करने के बाद भी परेशानी या सजा क्यों मिलती प्रतीत होती है? माना कि किसी व्यक्ति ने चिड़िया को मारने के लिए तीर चलाया और तीर छोड़ने बाद उसे किसी कारण से आत्म-ज्ञान हुआ और वो दुनिया को बताने लगा कि जीव-हत्या गलत कार्य है| लोग उसकी बातें सुनेगे पर जब थोड़ी देर बाद उस व्यक्ति के छोड़े हुए तीर से वो चिड़िया मरेगी, तो वो ही लोग कहेंगे कि एक तरफ तो आप तो ज्ञान कि बात कर रहे हो और ये आपके ही द्वारा छोड़े हुए तीर ने चिड़िया मार दी, तो व्यक्ति कहेगा कि वो तीर तो मैने आत्म-ज्ञान होने से पहले छोड़ा था| ये गलत कार्य पूर्व में अनजाने में किया गया था|

इसी प्रकार हम सब भी पूर्व जन्मों या इस जन्म में जाने-अनजाने में कई गलत कार्य करते आये हैं, पर इस जन्म में आत्म-ज्ञान होने के बाद भी पिछला किया हुआ आंशिक रूप से तो भुगतना पड़ेगा| इसीलिए गलतियों की सजा तो मिलेगी पर बहुत थोड़ी सी मिलेगी यानी नियमित ध्यान व नाम-जप करते हुए अगर परेशानियां आ रही हैं तो भी आप बिलकुल परेशान न हों|

ऐसा भी होता है कि – जब आप गुरु के बताए मार्ग पर चलते हैं तो नकारात्मक वृत्तियाँ आपको परेशान करने लगती हैं और आपको साधना के मार्ग से भटकाना चाहती हैं| ताकि आप सोचें कि इस मार्ग पर चलने से परेशानियां आ रहीं हैं| इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि कुछ किरायेदार वैसे बड़ी शांति से रहते हैं, पर जब उन्हें मकान खाली करने के लिए कहा जाता है तो वे कोई न कोई उपद्रव मचाते हैं एवं आसानी से मकान खाली नहीं करते|

 

Q15. मैं गुरुदेव की इस कृपा के बदले में क्या कर सकता हूँ? या मैं इस मिशन में किस प्रकार योगदान दे सकता हूँ?

Ans: गुरुदेव के इस मिशन को योगदान देने के बहुत तरीके हैं। ध्यान के अनुभव दूसरों को बतायें | इस ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों को देश-विदेश में बताने के प्रयास व इच्छा रखें|

आप स्वयं की क्षमतानुसार – किसी से मांगे बिना

  • सोशल मीडिया के द्वारा अधिकतम प्रचार संभव|
  • पैम्फलेट अपने-अपने क्षेत्र में स्वयं बाँटना या अख़बार में डलवाना। (एप्रॉक्स 1000 कार्ड्स @Rs 200/-)
  • आफिस, दुकान, या बिजनेस के द्वारा सम्पर्क में आने वाले लोगों को गुरुदेव के बारे में बताना |
  • सुबह-शाम या छुट्टी के दिन पार्क, मंदिर या पब्लिक प्लेस (सार्वजनिक स्थानों) में जाकर बताना
  • शाम के समय शहर कि आवासीय बस्तियों व कोलोनीज में जाया जा सकता है|
  • हर कॉलोनी में कोई एक ऐसा स्थान जैसे – किसी का घर, मंदिर का प्रांगण, पार्क, निगम की लाइब्रेरी आदि, साप्ताहिक या पाक्षिक मीटिंग के लिए चुना जा सकता है|
  • स्कूल, कॉलेज, फैक्ट्री आदि में प्रबंधन से अनुमति लेकर बताना|
  • स्कूल के बच्चों को छुट्टी के समय पैम्फलेट (approx 1000@Rs200/-) बांटे जा सकते हैं।
  • फैक्ट्री से शिफ्ट परिवर्तन के समय घर जाने वाले स्टाफ को सामग्री वितरित की जा सकती है|
  • विभिन्न संस्थाओं के नोटिस बोर्ड्स पर गुरुदेव के पैम्फलेट लगवाना।
  • जान पहचान के आधार पर अखबार, टी.वी. या अन्य मीडिया में गुरुदेव के बारे में समाचार निकलवाना
  • लोकल केबल से सम्पर्क कर ध्यान की जानकारी की स्ट्रिप चलाई जा सकती है
  • आपके एरिये के फिल्म टॉकीज में प्रचार किया जा सकता है|
  • यूनियन से या ऑफिस से अनुमति लेकर बस व ट्रक में स्टिकर लगा सकते हैं|
  • शहर के ऑटो/टेक्सी यूनियन से बात कर उनके पीछे, फ्लेक्स, स्टिकर आदि लगवा सकते हैं
  • एक-एक कर आपके कस्बे या शहर के सारे सरकारी विभाग, आफिस, कालेज, इंडस्ट्री, समाज कवर किये जा सकते हैं | किसी भी एक को इतना संतुष्ट कर लें कि वो उस विभाग में अन्य लोगों के लिए माध्यम बन जाये|
  • शहर के अनाथालय, जेल, नशा मुक्ति केन्द्रों, एन.जी.ओ से सम्पर्क किया जा सकता है|
  • होस्पिटल के बाहर दो लोग मिलकर स्टॉल लगा सकते हैं|
  • शहर के पुलिस-थानों एवं आर्मी (यदि आपके शहर मैं हो तो) से सम्पर्क कर सकते हैं|
  • दोपहर जब शॉप पर ग्राहक संख्या कम होती है तब किसी भी एक मार्केट का चुनाव कर दुकानदारों से सम्पर्क हो सकता है|
  • रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड पर रवाना होने वाले यात्रियों को एवं स्टैंड पर प्रतीक्षालय में बैठे लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं।
  • आपके शहर के प्याऊ, चाय, व पान की दुकानों पर स्टिकर्स चिपकाये जा सकते हैं|
  • हर शहर में कई प्रकार की जातियों के समाज, महासभाएं होती हैं उनकी कार्यकारिणी के मेम्बर्स को जाकर बताया जा सकता है कि गुरु सियाग सिद्धयोग मानवता के लिए है, न कि किसी जाति या धर्म का| इस प्रकार विभिन्न समाज के बहुत सारे लोग एक साथ एक मंच पर एकत्रित हो सकते हैं|
  • प्रबुद्ध वर्ग के लोगो से कुछ समय के लिए नियमित सम्पर्क
  • महानगरों में लोकल न्यूज़ पेपर्स, लोकल एरिये के लोगों को किसी स्थान पर एकत्रित कर सकते हैं| लोकल न्यूज़ पेपर्स में छोटा सा विज्ञापन देने से वे गुरुदेव पर आर्टिकल भी निकालने को तैयार हो जाते हैं|
  • आफिस, कालेज, इंडस्ट्री, समाज, कम से कम एक व्यक्ति को समय निकलकर ध्यान को भली-भांति समझाएं|
  • गांवों में ग्राम प्रधान या सरपंच से मिलकर लोगों को एकत्र कर ध्यान के बारे में बताया जा सकता है|
  • गांव की चौपाल एवं चाय की दुकानों पर आने वालों से ध्यान के बारे में चर्चा|
  • आसपास के इलाकों के मेले में या त्यौहारों के अवसर पर स्टॉल लगा सकते हैं|
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