(hi) गुरु सियाग योग

  • जीते जी मोक्ष एवं मानव के दिव्य रूपांतरण का मार्ग है, इस विधि को अपनाने से बीमारियाँ, नशे, एवं चिंताएं तो अपने आप ही मिटने लगती हैं।
  • ये साधना पतंजलि के अष्टांग योग का साक्षात्कार सरल एवं सहज रूप से करवाती है|
  • साधकों को कई सिध्धियों का भी अनुभव प्राप्त होता है|
  • इस साधना से वृत्ति परिवर्तन होने से तामसिक वृत्तियों से सात्विक वृत्तियों में परिवर्तन होने व्यक्ति देवत्व के मार्ग की ओर बढ़ते हैं – गुरुदेव तीन प्रकार की वृत्तियों की बात करते हैं – सात्विक (प्रकाशित, पवित्र, बुद्धिमान व धनात्मक), सत्व संतुलन की शक्ति है। सत्य के गुण अच्छाई, अनुरूपता, प्रसन्नता तथा हल्कापन हैं। जब किसी व्यक्ति में सतोगुणी वृत्ति प्रधान होती है तो अधिक चेतना की ओर उसे आगे बढ़ाती है जिससे वह अपने आपको कर्म बन्धनों सेमुक्त कर सके।
  • रजस (आवेश युक्त तथा ऊर्जावान), रजस गति की शक्ति है। रजस के गुण संघर्ष तथा प्रयास, जोश या क्रोध की प्रबल भावना व कार्य हैं। गुण अस्पष्टता, निर्णय की अयोग्यता तथा आलस्य हैं।
  • तमस (ऋणात्मक, अंधकारमय, सुस्त तथा आलस)। तमस निष्क्रियता तथा अविवेक की शक्ति है।

सभी में यह तीनों ही गुण (वृत्ति) होते हैं; परिस्थितियों के अनुसार तीनों गुण (वृत्ति) कम ज्यादा होते रहते हैं।यही वजह है कि कोई व्यक्ति सदैव अच्छा या बुरा, बुद्धिमान या मूर्ख, क्रियाशील या आलसी नहीं होता है। कभी-कभी बहुत अच्छा व्यक्ति अचानक ही बुरा (अहं, लालच, मूर्खता या गुस्से का) व्यवहार कर जाता है, तो कभी बुरा, मुर्ख या गुस्से वाला व्यक्ति, बहुत अच्छा, समझदारी का, या प्यार भरा व्यवहार करता है । वृत्तियों के बदलने के आधार पर व्यक्ति कि आदतें व व्यवहार भी बदलते रहते हैं ।

राजसिक या तामसिक वृत्ति प्रधान व्यक्ति सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु के समाप्त न होने वाले चक्र में फँसता है। नियमित ध्यान व नाम-जप द्वारा व्यक्ति निरंतर सात्विकता कि स्थिति में बना रह सकता है।सिद्धयोग की साधना, सात्विक गुणों का उत्थान करके अन्ततः मोक्ष तक पहुँचाती है, जो अन्तिम रूप से आध्यात्मिक मुक्ति है।

वृत्ति परिवर्तन से बुरी आदतें छूट जाती हैनिरन्तर नाम जप व ध्यान से वृत्ति परिवर्तन भी होता है। मनुष्य में मूलतः तीन वृत्तियों होती हैं। सतोगुणी, रजोगुणी एवं तमोगुणी। मनुष्य में जो वृत्ति प्रधान होती है उसी के अनुरूप उस का खानपान एवं व्यवहार होता है। निरन्तर नाम जप के कारण सबसे पहले तमोगुणी (तामसिक) वृत्तियाँ दबकर कमजोर पड़ जाती हैं। साधना सेसतोगुणी वृत्ति इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि फिर से तमोगुणी वृत्तियाँ पुनः हावी नहीं हो पाती हैं। अन्ततः मनुष्य की सतोगुणी प्रधानवृत्ति हो जाती है। ज्यों-ज्यों मनुष्य की वृत्ति बदलती जाती है दबने वाली वृत्ति के सभी गुणधर्म स्वतः ही समाप्त होते जाते हैं। वृत्ति बदलने से उस वृत्ति के खान–पान से मनुष्य को आन्तरिक घृणा हो जाती है। इसलिये बिना किसी कष्ट के सभी प्रकार की बुरी आदतें अपने आप छूट जाती हैं।

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